2021 में रजनीकांत और कमल हासन की राजनीतिक जोड़ी बनी तो होगी 'ब्लॉकबस्टर' की उम्मीद


चेन्नै
रजनीकांत भगवान की कसमें खाते हैं लेकिन कमल हासन को भगवान के होने पर विश्वास न के बराबर है। फिल्म इंडस्ट्री के दोनों महारथियों में जमीन-असमान का अंतर है। विचारधारा से लेकर जिस तरह से दोनों ने अपने करियर बनाए हैं, दोनों अलग रहे हैं। एक की इमेज ऐक्शन हीरो की रही तो दूसरा हमेशा एक्सपेरिमेंट करता रहा। इस पूरे सफर के दौरान दोनों सितारे फिल्म इंडस्ट्री पर राज करते रहे। यही नहीं, दोनों ने अपनी दोस्ती भी 44 साल तक बनाकर रखी है जो अपने आप में एक मिसाल है।


अब दोनों स्टार्स राजनीति पर अपनी नजरें गड़ाए हैं। कमल ने 18 महीने पहले मक्कल निधि मय्यम लॉन्च की और 2019 के आम चुनावों का अनुभव भी लिया। उधर, रजनीकांत ने 31 दिसंबर, 2017 को फैन्स के सामने राजनीति में कदम रखने की अपनी इच्छा भी रखी। हालांकि, राज्य विधानसभा चुनाव में 18 महीने बाकी रह गए हैं और उन्होंने अब तक अपनी पार्टी नहीं लॉन्च की है।

जरूरत पड़ने पर साथ आने के संकेत
रजनीकांत ने संकेत दिए हैं कि उनकी पार्टी आध्यात्मिक राजनीति करेगी और कमल ने लेफ्ट की ओर झुकाव के बावजूद मध्यमार्ग अपनाया है। कमल ने हमेशा से यह साफ रखा है कि वह 'भगवा' के साथ कभी नहीं होंगे। वहीं रजनी को भले ही हमेशा हिंदुत्व के साथ देखा गया हो, उन्होंने भी यह साफ किया है कि उनका 'भगवाकरण' किए जाने की कोशिशों में वह फंसाए नहीं जा सकेंगे। अब दोनों ने ही यह संकेत भी दिए हैं कि राजनीतिक रूप से जरूरत पड़ी तो दोनों हाथ मिलाने से पीछे नहीं हटेंगे।


...तो कौन होगा सीएम
हालांकि, इसके बाद एक नई बहस शुरू हो गई है कि दोनों के बीच आम राय किस बात पर होगी। दोनों ही प्रतिष्ठित ऐक्टर्स होने के कारण सीएम पद के मजबूत दावेदार होंगे। इसके बाद रजनी ने फौरन साफ किया कि राजनीति और सीएम पद की दावेदारी को लेकर अटकलें लगाना अभी जल्दबाजी है। उन्होंने कहा, 'ये मुद्दे चुनाव के नजदीक चर्चा में आने चाहिए।' उन्होंने साथ ही यह भी कहा, 'तमिलनाडु के लोगों को 2021 में राजनीति में एक चमत्कार करना चाहिए।'

तमिल राजनीति पर असर
रजनी और कमल के साथ आने की चर्चाओं के बीच एक बड़ा सवाल यह भी है कि इसका तमिल राजनीति पर क्या असर पड़ेगा। राज्य में 1977 के बाद से अब तक 42 साल में तीसरा मोर्चा कभी सफल नहीं रहा है। 1977 में एमजीआर के सीएम बनने के बाद यह दोहराया नहीं जा सका है। कड़ी मशक्कत के बाद भी कांग्रेस भी तीसरे स्थान पर ही रह जाती है। ऐक्टर विजयकांत की पार्टी डीएमडीके को भी यही नतीजे देखने पड़े हैं। पीपल्स वेलफेयर फ्रंट और बीजेपी को भी कोई सफलता नहीं मिली है।


रजनी-कमल से कई उम्मीदें
तमिल लेखक और राजनीतिक टिप्पणीकार तमिलरुवी मण्यन का कहना है कि यह तथ्य पुराने हैं और वह इनसे सहमत नहीं हैं। उन्होंने कहा है, 'अगर रजनी और कमल यह बड़ा कदम उठाते हैं तो इसका वोटरों पर बड़ा असर होगा, जिनमें से ज्यादातक एआईएडीएमके और डीएमकी से परेशान हो चुके हैं।' मण्यन ने कहा कि रजनी से उम्मीद है कि वह अगले साल अपनी पार्टी लॉन्च कर देंगे और अपने नेतृत्व में एक फ्रंट का गठन करेंगे। उधर निलंबित कांग्रेस सदस्य आर थयगराजन का कहना है कि रजनीकांत अकेले ही खेल बदल सकते हैं। दोनों के साथ आने पर चीजें और बेहतर हो होंगी।

कई संशय बरकरार
यह भी एक बड़ा सवाल है कि क्या दोनों एआईएडीएमके और डीएमके को पीछे छोड़ सकेंगे। कुछ टॉलीवुड मेगास्टार चिरंजीवी और उनके भाई पवन कल्याण की राजनीतिक असफलता का उदाहरण देते हैं। उधर, द्रविड़ियन चर्चा के बीच रजनी-कमल गठबंधन को संशय से देखा जाता है। द्रविड़ इयक्का तमिझर पेरावई के महासचिव सूबा वीरापांडण्यन का कहना है कि रजनी ने तो अभी अपनी पार्टी भी शुरू नहीं की है। उनके बयान सिर्फ शब्दों के खोखले खेल हैं। ऐसे में 2021 में तमिलनाडु विधानसभा चुनाव ऐसे ब्लॉकबस्टर होने वाले हैं जिनका सबको बेसब्री से इंतजार रहेगा।