बूंदी बस हादसा-4 पुलिसवालों और दोस्त के साथ नदी में कूदा सरपंच, सरिया से शीशे तोड़कर सवारियों को बाहर निकाला


बूंदी. राजस्थान के बूंदी जिले में शादी में शामिल होने जा रहे परिवार की बस पुलिया से नदी में गिर गई। हादसे में तीन बच्चों और 11 महिलाओं समेत 24 लोगों की मौत हो गई। बुधवार सुबह करीब साढ़े 9 बजे हुए हादसे के बाद स्थानीय लोगों की भीड़ नदी पर बने पुल और आसपास इकट्‌ठा हो गई। लेकिन मदद के बजाए वीडियो बनाती रही। तभी गुहाना के सरपंच सुनील मीणा, उनके दोस्त राजकुमार और दो अन्य साथी मौके पर पहुंचे। इसके बाद सुनील और देगड़ा थाने के 4 पुलिस जवानों ने हौंसला दिखाया। नदी में छलांग लागाकर करीब 12 फीट गहरे पानी में डूबी बस तक पहुंचे। वहां लोहे की सब्बल (सरिया) से बस की बंद खिड़कियों के शीशे तोड़े और अंदर फंसी सवारियों को बाहर निकाला।


'आज सुबह दौसा जाने के लिए रवाना होना था। मैं घर पर चाय पी रहा था। तभी कांस्टेबल महावीर सिंह का फोन आया। उसने कहा कि बड़ा हादसा हो गया है। मेज नदी में पुलिया से बस गिर गई। काफी लोग अंदर फंसे हैं। इसके बाद बिना कुछ आगे बात किए मैंने फोन काटा और राजकुमार और दो साथियों को लेकर अपनी गाड़ी से तुरंत रवाना हो गया। 9 किमी. की दूरी 11 मिनट में पूरी करके नदी पर पहुंचा। वहां चारों तरफ सैंकड़ों की भीड़ थी। लेकिन वह मदद के बजाए वीडियो बनाने में जुटी हुई थी। तब तक एक भी व्यक्ति नदी में डूबी बस से बाहर नहीं आया था।'


'बस से निकालकर लोगों को कंधों पर उठाकर टापू पर लाए'


'मैंने अपने दो साथियों को नदी के किनारे पर खड़ा किया। फिर मैंने राजकुमार, 4 पुलिसकर्मी गिरिराज, रामचरण, रूपनारायण व एक अन्य के साथ नदी में छलांग लगा दी। हम सभी बस तक पहुंचे। बस की खिड़कियों के शीशे बंद थे। अंदर सभी सवारियां बेसुध थीं। तब लोहे के सरियों से खिड़की के शीशे तोड़े। दरवाजा खोला। किसी तरह भीतर फंसी महिलाओं, बच्चों और पुरुषों को बाहर लाना शुरू किया। उन्हें कंधे पर रखकर और रस्सियों से खींचकर नदी के बीच में बने एक टीले पर लाए। उल्टा लेटा दिया। इस बीच एक दुकान में नाव रखी होने का पता चला। तब वे अपने साथियों के साथ नाव लेकर आए। इसके जरिए बस की सवारियों को बाहर निकालकर टापू पर लाए।'


'समझ नहीं आ रहा था, सवारियों को बाहर निकाले या पेट से पानी बाहर निकालें'


'हादसे के काफी देर तक कोई प्रशासनिक सहायता नहीं पहुंची। न कोई डॉक्टर था। न क्रेन और न ही एंबुलेंस। ऐसे में हम समझ नहीं पा रहे थे कि बस में फंसी सवारियों को बाहर निकालें या फिर जिन्हें बाहर लेकर टीले तक आ गए हैं उनकी जान बचाई जाए। उनके पेट में भरा हुआ पानी निकालें। हम लोग बस से लोगों को निकालने में लग रहे। बस में सिर्फ 6 लोग थे, जिनके शरीर में हरकत थी। बाकी लोग पूरी तरह से बेसुध थे।'


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