पाक दूतावास के जासूसों पर भारत में क्यों नहीं चल सकता मुकदमा, डिप्लोमैटिक इम्युनिटी है वजह


नई दिल्ली
पाकिस्तान की ओर से ना सिर्फ सीमा पार से नापाक हरकतें की जा रही हैं, बल्कि दिल्ली स्थित पाकिस्तान हाई कमीशन का भी नापाक इरादों को पूरा करने के लिए इस्तेमाल हो रहा है। पाक हाई कमीशन के दो अधिकारियों को जासूसी करते रंगे हाथों पकड़ा गया है, जिनका नाम आबिद हुसैन और ताहिर हुसैन है। विदेश मंत्रालय के अनुसार दोनों को पर्सन नॉन-ग्रेटा यानी अवांछित व्यक्ति घोषित कर दिया गया है और उन्हें 24 घंटे में देश छोड़ना होगा।

यहां पर एक सवाल हर भारतीय को परेशान कर रहा है कि आखिर जब पाकिस्तानी लोग देश के अंदर ही जासूसी करते हुए रंगे हाथों पकड़े गए हैं तो फिर उन्हें छोड़ा क्यों जा रहा है? आखिर उन पर मुकदमा क्यों नहीं चलाया जा रहा, ताकि उन्हें उनके किए की सजा दी जा सके?


2016 में भी हुई थी ऐसी घटना
पिछली बार इस तरह की घटना 2016 में हुई थी। तब भारत में पाकिस्तानी हाई कमिशन में काम करने वाले महमूद अख्तर को अवैध तरीके से संवेदनशील दस्तावेज हासिल करने के आरोप में पकड़ा था। सरकार ने उनके खिलाफ भी पर्सन नॉन-ग्रेटा (अवांछित व्यक्ति) जारी करते हुए वापस पाकिस्तान भेज दिया था। तब भी यही सवाल लोगों को परेशान कर रहा था कि आखिर उसे छोड़ क्यों दिया?


मुकदमा नहीं चलाए जाने की ये है वजह
पाकिस्तान हाई कमीशन के इन दोनों लोगों पर भारत में मुकदमा इसलिए नहीं चलाया जा सकता है क्योंकि ये लोग डिप्लोमैट यानी राजनयिक हैं। डिप्लोमैटिक इम्युनिटी के तहत किसी भी राजनयिक पर दूसरे देश में मुकदमा नहीं चल सकता है। ये एक तरह का अंतरराष्ट्रीय कानून है, जो राजनयिकों को दूसरे देश में सुरक्षा देता है।


क्या है डिप्लोमैटिक इम्युनिटी?
डिप्लोमैटिक इम्युनिटी के तहत किसी भी देश के राजनियक और उसके परिवार की दूसरे देश में सुरक्षा करनी होती है। यानी जैसे पाकिस्तान का राजनयिक है तो उसकी भारत में हर हाल में सुरक्षा करनी होगी। ठीक ऐसे ही भारत के राजनयिक को पाकिस्तान में वहां की पुलिस या सेना कोई नुकसान नहीं पहुंचा सकती। देशों के पास सिर्फ इतना ही विकल्प होता है कि राजनयिक अगर किसी गैर-कानूनी काम में लिप्त पाया जाता है तो उसे उसके देश वापस भेज दिया जाए। 1961 की वियना कन्वेंसन ऑन डिप्लोमैटिक रिलेशन्स के जरिए इसे लागू किया गया है।


कहां से आई से डिप्लोमैटिक इम्युनिटी?
डिप्लोमैटिक इम्युनिटी का कॉन्सेप्ट आज से नहीं, बल्कि रामायण-महाभारत के वक्त से है। यानी डिप्लोमैटिक इम्युनिटी 1 लाख साल पुरानी परंपरा है, जिसमें वक्त के साथ थोड़ बहुत बदलाव होते रहे हैं। तब भी किसी भी राजदूत को नुकसान नहीं पहुंचाया जा सकता था। जब रावण ने हनुमान जी को मारने का आदेश दिया था तो उसके छोटे भाई विभीषण ने तुरंत कहा था कि नियम के मुताबिक किसी भी राजनयिक को नहीं मारा जा सकता है।


राजनयिक को कब हिरासत में लिया जा सकता है?
अगर किसी राजनयिक से कोई खतरा हो, सिर्फ तभी उसे हिरासत में लिया जा सकता है। वो भी ये सुनिश्चित करते हुए कि उसे कोई चोट ना पहुंचे।


किस स्थिति में दूसरे देश में चल सकता है राजनयिक पर मुकदमा?
ऐसा सिर्फ एक ही स्थिति में हो सकता है जब राजनयिक पर से डिप्लोमैटिक इम्युनिटी को हटा लिया जाए और ऐसा सिर्फ राजनियक का देश ही कर सकता है। हालांकि, अपने ही राजनयिक पर दूसरे देश में मुकदमा चलना शर्म की बात होती है, इसलिए ऐसा होता बहुत ही कम है। हां वो बात अलग है कि राजनयिक के देश वापस आने के बाद वहां पर उसके खिलाफ कोई मुकदमा चलाया जाए। 


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