न्यायालय महाराष्ट्र में सरकार गठन के मामले में मंगलवार को सुनायेगा आदेश


नयी दिल्ली, उच्चतम न्यायालय ने सोमवार को कहा कि वह महाराष्ट्र में देवेन्द्र फडणवीस को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाने के राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी के फैसले के खिलाफ शिवसेना-राकांपा-कांग्रेस की याचिका पर मंगलवार को सुबह साढ़े दस बजे अपना आदेश सुनायेगा। न्यायमूर्ति एन वी रमण, न्यायमूर्ति अशोक भूषण और न्यायमूर्ति संजीव खन्ना की तीन सदस्यीय पीठ संभवत: सदन में बहुमत सिद्ध करने का आदेश देगी। शिवसेना-राकांपा-कांग्रेस ने सोमवार को ही देवेन्द्र फडणवीस को सदन में अपना बहुमत सिद्ध करने का आदेश देने का अनुरोध किया लेकिन फडणवीस और उपमुख्यमंत्री अजित पवार ने इसका विरोध किया। राज्यपाल कोश्यारी ने 23 नवंबर को जब फडणवीस को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलायी थी तो उन्हें अपना बहुमत साबित करने के लिये 14 दिन का समय दिया था। इस मामले में सोमवार को सुनवाई शुरू होते ही केन्द्र और राज्यपाल के सचिव की ओर से सालिसीटर जनरल तुषार मेहता ने महाराष्ट्र में चुनाव के बाद के सारे घटनाक्रम का विवरण दिया और कहा कि राज्यपाल को शीर्ष अदालत में कार्यवाही से छूट प्राप्त है। मेहता ने दावा किया कि महाराष्ट्र में सरकार के गठन के लिये भाजपा को राकांपा के सभी 54 विधायकों का समर्थन प्राप्त था और उन्होंने इस गठबंधन की याचिका पर जवाब दाखिल करने के लिये दो तीन दिन का समय देने का अनुरोध किया। शिवसेना-कांग्रेस-राकांपा गठबंधन ने भाजपा के देवेन्द्र फडणवीस को मुख्यमंत्री और राकांपा के अजित पवार को उप मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाने के राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी के फैसले को चुनौती दी है। केन्द्र ने पीठ से कहा कि राज्यपाल ने अपने विवेकाधिकार का इस्तेमाल करते हुये 23 नवंबर को सबसे बड़े दल को सरकार गठित करने के लिये आमंत्रित किया। सालिसीटर जनरल तुषार मेहता ने पीठ से कहा कि महाराष्ट्र के राज्यपाल को सरकार गठित करने के लिये घूम घूम कर यह पता लगाने की आवश्यकता नहीं है कि किस दल के पास बहुमत है। उन्होंने कहा कि सवाल यह है कि क्या कोई दल यहां आकर 24 घंटे के भीतर बहुमत सिद्ध करने के लिये न्यायालय से हस्तक्षेप का अनुरोध कर सकता है ? शीर्ष अदालत ने फडणवीस को सरकार बनाने के लिये आमंत्रित करने संबंधी राज्यपाल कोश्यारी के पत्र का अवलोकन किया और फिर कहा कि यह निर्णय करना होगा कि क्या मुख्यमंत्री के पास सदन में बहुमत है या नहीं। सालिसिटर जनरल ने कहा कि चुनाव के नतीजे आने के बाद राज्यपाल ने शिवसेना, भाजपा, राकांपा को सरकार गठित करने के लिये आमंत्रित किया था और इनके कामयाब नहीं होने के बाद ही प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लगाया गया। राकांपा के नेता और उप मुख्यमंत्री अजित पवार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मनिन्दर सिंह ने पीठ से कहा कि राज्यपाल ने नियमानुसार ही फडणवीस को सरकार गठित करने के लिये आमंत्रित किया जो बिल्कुल सही था। इससे पहले, शिवसेना की ओर से बहस शुरू करते हुये वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने तीनों दलों की प्रेस कॉन्फ्रेन्स का हवाला दिया जिसमें उद्धव ठाकरे को महाराष्ट्र का अगला मुख्यमंत्री घोषित किया गया था। सिब्बल ने कहा, ''ऐसी कौन सी राष्ट्रीय आपदा थी कि सवेरे पांच बज कर 27 मिनट पर राष्ट्रपति शासन खत्म किया गया और फिर सुबह आठ बजे मुख्यमंत्री पद की शपथ दिला दी गई । ''सिब्बल ने कहा कि गठबंधन के पास 154 विधायकों के हलफनामे हैं और अगर भाजपा के पास बहुमत है तो उसे 24 घंटे के भीतर इसे साबित करने के लिये कहा जाना चाहिए। राकांपा और कांग्रेस की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने इसे 'निचले स्तर का छल' करार दिया और सवाल किया कि क्या एक भी राकांपा विधायक ने अजित पवार से कहा कि उसने भाजपा के साथ हाथ मिलाने के लिये उनका समर्थन किया। विशेष पीठ के समक्ष सोमवार को सुनवाई शुरू होने पर मेहता ने न्यायालय के निर्देशानुसार राज्यपाल और फडणवीस के पत्र पेश किये। पीठ ने रविवार को ये पत्र पेश करने का निर्देश दिया था। शीर्ष अदालत ने कहा कि वह शिवसेना-राकांपा-कांग्रेस गठबंधन की इस याचिका पर विचार नहीं कर रही है कि उन्हें महाराष्ट्र में सरकार गठित करने के लिये आमंत्रित किया जाये। भाजपा और कुछ निर्दलीय विधायकों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने कहा कि दोनों ही पक्षों के चुनाव पूर्व गठबंधन के साझेदार परस्पर विरोधी हो गये थे। उन्होंने कहा कि राकांपा अपने विधानमंडल में अपने दल के नेता अजित पवार के माध्यम से चुनाव पूर्व की अपनी विरोधी भाजपा के साथ आ गयी थी। इस तरह वह अपने चाचा शरद पवार से अलग हुए जिन्होंने चुनाव से पहले राकांपा की विरोधी रही शिवसेना से हाथ मिला लिया। रोहतगी ने कहा कि फडणवीस के पास अजित पवार का समर्थन का पत्र था और उन्होंने सरकार गठन करने के लिये 170 विधायकों की सूची पेश की। रोहतगी ने कहा, ''यह किसी का मामला नहीं है कि फडणवीस द्वारा राज्यपाल को सौंपे गये दस्तावेज फर्जी थे।'' उन्होंने कहा कि फडणवीस के पास सरकार गठन के लिये जरूरी सारे दस्तावेज थे और पवार परिवार के भीतर ही कुछ तनाव व्याप्त था। उन्होने कहा, ''एक पवार मेरे साथ है, दूसरा पवार शीर्ष अदालत में है।'' उन्होंने कहा कि शिवसेना-राकांपा-कांग्रेस गठबंधन नाहक ही यह आरोप लगा रहा है कि किसी तरह की खरीद फरोख्त हो रही है। रोहतगी ने कहा, ''वास्तव में, शुक्रवार तक, वे खरीद फरोख्त में संलिप्त थे।'' मेहता और रोहतगी ने कहा कि चुनाव नतीजों के बाद दूसरे दल जब आवश्यक संख्या जुटाने में असफल रहे तो राज्यपाल ने सबसे बड़े दल को सरकार बनाने के लिये आमंत्रित किया। रोहतगी ने कहा, ''अब, सवाल यह है कि क्या यह न्यायालय कह सकता है कि सदन में एक निश्चित समय सीमा के भीतर बहुमत साबित करने का आदेश दिया जा सकता है।'' उन्होंने कहा, ''गठबंधन उच्चतम न्यायालय को इस बात का निर्णय करने के लिये कह रहा है कि राज्यपाल और विधानसभा को किस तरह काम करना चाहिए। उन्होंने कहा कि न्यायालय सदन की कार्यवाही में हस्तक्षेप नहीं कर सकता, जिसका संचालन विधानसभा के नियमों से होता है, और राज्यपाल को न्यायिक समीक्षा से छूट प्राप्त है।'' मेहता ने कहा कि इसे लेकर कोई विवाद नहीं है कि अंतत: सदन में ही बहुमत सिद्ध करना होगा और कोई दल यह नहीं कह सकता कि ऐसा 24 घंटे के भीतर होना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि क्या शीर्ष अदालत सदन की कार्यवाही की निगरानी कर सकती है जो सांविधानिक रूप से निषेध है। सिब्बल और सिंघवी ने कहा कि यह पहली नजर में अंतरिम आदेश पारित करने योग्य मामला है। उन्होंने कहा कि राष्ट्रपति शासन हटाने और फडणवीस को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाने की इतनी जल्दी क्या थी? क्या इस तत्परता की जरूरत को दर्शाने संबंधी कोई तथ्य रिकार्ड पर है? महाराष्ट्र की 288 सदस्यीय विधानसभा के चुनाव में भाजपा सबसे बड़े दल के रूप में उभरी थी जिसके 105 विधायक हैं जबकि शिवसेना के 56, एनसीपी के 54 और कांग्रेस के 44 विधायक हैं।


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