दवाओं के गलत विज्ञापन देने पर दर्ज होगा क्रिमिनल केस!


नई दिल्ली
अपनी दवाओं का बहुत बढ़ा-चढ़ाकर प्रचार करने वाली कंपनियों को जल्द भारी जुर्माने और आपराधिक मुकदमों का सामना करना पड़ सकता है। इनमें खासतौर से ऐसी फार्मास्युटिकल्स कंपनियां शामिल हैं, जो अपनी दवाओं के जरिए एक यौनांग के साइज और आकार, स्तन के रूप और संरचना या गोरेपन में सुधार का भ्रामक दावा करती हैं। स्वास्थ्य मंत्रालय के अधिकारियों ने यह जानकारी दी।

उन्होंने बताया कि मंत्रालय ने मौजूदा कानूनों में बदलाव की सिफारिश करने के लिए एक कमिटी का गठन किया है। अधिकारी ने बताया कि फार्मास्युटिकल्स कंपनियां भ्रामक विज्ञापनों के जरिए अपनी दवाओं के प्रभाव और सुरक्षा को लेकर गलत जानकारी देती हैं, जिससे लोगों का स्वास्थ्य खतरे में पड़ जाता है। उन्होंने कहा कि ऐसी कंपनियों को भ्रामक विज्ञापन देने से रोकने के लिए उनके खिलाफ आपराधिक मुकदमा दर्ज कराने, शीर्ष मैनेजरों को जेल भेजने और ऐसी कंपनियों पर भारी जुर्माना लगाने की सिफारिशें की जा सकती हैं।

कमिटी के एक सदस्य ने बताया, 'कानून में अभी जुर्माने का जो प्रावधान है, वह कंपनियों को ऐसे भ्रामक दावे करने से रोकने में नाकाफी है।' उन्होंने बताया कि फिलहाल बढ़ा-चढ़ाकर दावे करने वाले विज्ञापन करने वाले 500 रुपये का मामूली जुर्माना देकर बच निकलते हैं। जॉइंट हेल्थ सेक्रटरी मंदीप भंडारी की अध्यक्षता वाली इस कमिटी की 13 दिसंबर को बैठक हुई थी, जिसमें ड्रग्स ऐंड मैजिक रेमेडीज (ऑब्जेक्शनेबल ऐडवर्टाइजमेंट) ऐक्ट, 1954 के प्रावधानों में बदलाव पर चर्चा की गई।

कमिटी, ड्रग्स ऐंड कॉस्मेटिक्स रूल्स, 1945 के शेड्यूल J में शामिल बीमारियों के लिए विज्ञापन देने वालों के खिलाफ सख्त दंडात्मक कार्रवाई पर विचार कर रही है। इस शेड्यूल में ऐसी बीमारियों और रोगों की सूची है, जिसे कोई दवा ठीक करने या रोकने का दावा नहीं कर सकती। सूची में कैंसर, भ्रूण के लिंग का परिवर्तन, त्वचा को गोरा करना, यौन सुख के लिए इंसान की क्षमता बढ़ाने, शीघ्रपतन, यौन नपुंसकता, बालों के समय से पहले सफेद होने, स्तन के रूप और संरचना में बदलाव और दोबारा युवा बनाने की शक्ति जैसे दावे शामिल हैं।

अधिकारी ने बताया, 'मौजूदा कानूनों में जुर्माने को अधिक कड़ा करने की जरूरत है। हमें जुर्माने और कैद के प्रावधानों को बढ़ाकर DMRA को अधिक प्रभावी बनाना होगा।' फिलहाल, पहली बार गलत दावा करने पर '6 माह तक की कैद या जुर्माना या दोनों' का प्रावधान है। इसके बाद दोबारा या कितनी भी बार गलत दावा करने पर 'एक साल तक अधिकतम कैद या जुर्माना या दोनों' का प्रावधान है।

इसके अलावा मौजूदा कानून सिर्फ अखबारों में स्वास्थ्य से जुड़े गलत दावे देने पर रोक लगाते हैं, जबकि टीवी या इंटरनेट पर गलत दावों की समस्या से निपटने के लिए इनमें कोई प्रावधान नहीं हैं। एक सूत्र ने बताया, 'यह सोशल मीडिया का युग है और कानून को भी इसके हिसाब से बदलने की जरूरत हैं। ऐसे में मौजूदा कानूनों में संशोधन करना ही होगा।' स्वास्थ्य मंत्रालय ने 10 दिसंबर को जारी एक नोटिफिकेशन में कमेटी के गठन की सूचना दी थी।

नोटिस में कहा गया था, 'कमिटी अपनी पहली बैठक के तीन हफ्तों के अंदर सिफारिशों को सौंपेगी।' कमिटी के सदस्यों में ड्रग कंट्रोलर जनरल ऑफ इंडिया (DCGI), आयुष मंत्रालय, सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय और कानून मंत्रालय के प्रतिनिधि और हरियाणा, महाराष्ट्र, कर्नाटक सहित कई राज्यों के ड्रग कंट्रोलर शामिल हैं।


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