नागरिकता बिल के खिलाफ इतना क्यों भड़क गए असम के लोग, जानें कारण


नई दिल्ली
नागरिकता (संशोधन) विधेयक, 2019 को लोकसभा से मंजूरी मिलते ही असम में प्रदर्शन होने लगे और यह दिनोंदिन उग्र होते जा रहे हैं। बुधवार को जब इस विधेयक पर राज्यसभा में चर्चा हो रही थी, उस वक्त प्रदर्शनकारियों ने राजधानी दिसपुर में राज्य सरकार के सचिवालय को घेर रखा था। हालत बिगड़ने के कारण कई ट्रेनों को रद्द किया जा चुका है। स्थिति पर नियंत्रण के लिए सेना को कमान संभालनी पड़ गई है। ऐसे में सवाल यह उठता है कि आखिर असम के लोग सिटिजनशिप (अमेंडमेंट) बिल (CAB) के खिलाफ इस तरह क्यों भड़क गए हैं? इस बिल को लेकर उनके मन में क्या आशंकाएं हैं? क्या इस विधेयक के कानून बन जाने के बाद नागरिकता के नए प्रावधान से असम के मूल निवासियों के हितों को ठेस पहुंचने का अंदेशा है? आइए जानते हैं इन सवालों के जवाब...


1. असम में इतने उग्र प्रदर्शन की वजह क्या है?
बंगाली बहुल बराक वैली को छोड़कर असम के शेष सभी हिस्से में मूल निवासियों इस बात को लेकर आशंकित हैं कि कानून बदलने के बाद बांग्लादेश से आए हिंदुओं को नागरिकता मिल जाएगी और तब ये बांग्लादेशी हिंदू उनके (असम के मूल निवासियों के) हितों को चुनौती देंगे। इन बांग्लादेशी हिंदुओं के कारण उनकी संस्कृति, भाषा, परंपरा, रीति-रिवाजों पर असर पड़ेगा। साथ ही, राज्य के संसाधनों का बंटवारा भी करना पड़ेगा। नए कानून के तहत नागरिकता के लिए भारत में निवास की समयसीमा वर्ष 2014 तय की गई है, लेकिन प्रदर्शनकारियों का कहना है कि असम ने 1951 से 1971 तक आए शरणार्थियों का बोझ उठाया। उनका कहना है कि देश के दूसरे किसी राज्य में इतनी भारी संख्या में शरणार्थी नहीं आए। इसलिए असम शरणार्थियों का अब और बोझ नहीं उठा सकता। प्रदर्शनाकरियों का कहना है कि उन्हें केंद्र सरकार पर भरोसा नहीं है और नागरिकता बिल से असम अकॉर्ड के प्रावधानों को ठेस पहुंचेगा।


2. असम अकॉर्ड क्या है?
1979 में असम के मूल निवासियों ने महसूस किया कि मंगलदोई लोकसभा के उपचुनाव में वोटरों की संख्या अप्रत्याशित तौर पर बढ़ गई है। तब उन्हें लगा कि यह बांग्लादेश से आए अवैध शरणार्थियों की वजह से हुआ है। बस क्या था, मूल निवासियों ने घुसपैठ के खिलाफ प्रदर्शन करना शुरू कर दिया जो हिंसक रूप अख्तियार कर लिया। तब छह वर्ष तक चले हिंसक प्रदर्शनों में 885 लोग मारे गए। असम के लोगों का गुस्सा तब शांत हुआ जब 1985 में केंद्र की तत्कालीन राजीव गांधी सरकार ने असम अकॉर्ड पर दस्तखत किया। इस समझौते के तहत 25 मार्च, 1971 के बाद आए विदेशियों की पहचान कर उन्हें देश निकाला देने का वादा किया गया। दूसरे राज्यों के लिए यह समयसीमा 1951 की थी। अब नागरिकता बिल में 2014 का नई समयसीमा तय कर दी गई। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि नई समयसीमा से असम अकॉर्ड की अवहेलना हो रही है।

3. एनआरसी क्या है?
असम अकॉर्ड में नैशनर रजिस्टर ऑफ सिटिजंश (एनआरसी) लागू करने का वादा किया गया था। इसके तहत विदेशियों की पहचान कर उन्हें देश से निकालने की बात कही गई थी। लेकिन, 35 वर्षों तक एनआरसी पर कोई काम नहीं हुआ। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर जब एनआरसी की प्रक्रिया प्रारंभ हुई और 31 अगस्त, 2019 को जब फाइनल एनआरसी लिस्ट का प्रकाशन हुआ तो असम में 19 लाख लोगों के नाम इससे बाहर हो गए। एनआरसी लिस्ट में जगह नहीं बना पाने वाले ज्यादातर हिंदू और मूल आदिवासी समुदाय के लोग थे। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि कैब से एनआरसी निष्प्रभावी की प्रक्रिया ध्वस्त हो जाएगी और अवैध शरणार्थियों को नागरिकता मिल जाएगी। हालांकि, असम गण परिषद (एजीपी) का कहना है कि अमस अकॉर्ड के क्लाउज 6 से असम को कैब के दुष्प्रभावों से बचा लेगा।


4. असम अकॉर्ड का क्लॉज 6 क्या है?
असम अकॉर्ड के क्लाउज 6 में असम के मूल निवासियों की सामाजिक, सांस्कृतिक एवं भाषाई पहचान और उनके धरोहरों के संरक्षण तथा संवर्धन के लिए संवैधानिक, कार्यकारी और प्रशासनिक व्यवस्था की गई है। क्लॉज 6 के अंदर एक प्रावधान था कि इस क्लॉज के जरिए भारत सरकार एक कमिटी गठित करेगी जो असम को मूल निवासियों की पहचान और उनके अधिकारों के संरक्षण सुनिश्चित करेगी।


5. इनर लाइन ऑफ परमिट क्या है?
बंगाल ईस्टर्न फ्रंटियर रेग्युलेशन, 1873 के तहत सीमाई इलाकों के लिए इनर लाइन ऑफ परमिट (आईएलपी) सिस्टम लागू किया गया। इसके तहत, बाहर के लोगों को (भारतीयों को भी) निश्चित इलाकों में आईएलपी के जरिए ही प्रवेश की अनुमति दी जाती है। बाहरी लोगों को उन इलाकों में बसने की अनुमति नहीं होती है। अब आईएलपी सिस्टम का इस्तेमाल कुछ इलाकों कैब के दायरे से बाहर रखने के लिए किया जा रहा है। साथ ही, आदिवासियों के संरक्षण के लिए भारतीय संविधान की छठी अनुसूची के तहत अधिसूचित (नोटिफाइड) इलाकों को भी कैब के दायरे से बाहर रखा गया है। पूर्वोत्तर के राज्यों के ज्यातार इलाकों में आईएलपी सिस्टम लागू है। असम, करबी आंगलोंग, दिमा हासो और बोडोलैंड को छठी अनुसूची के तहत संरक्षित किया गया है। हालांकि, इनमें असम के कुल 33 में से सिर्फ सात जिले ही आते हैं।


6. नागरिकता बिल के खिलाफ प्रदर्शन का केंद्र असम क्यों बन गया?
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने पूर्वोत्तर के राज्यों के मुख्यमंत्रियों, वहां के राजनीतिक दलों, विभिन्न संगठनों एवं अन्य संबंधित पक्षों के साथ नागरिकता बिल के विभिन्न पहलुओं पर गहन विचार-विमर्श किया। उन्होंने सबको आश्वस्त किया कि आईएलपी और छठी अनुसूची वाले पूर्वोत्तर के इलाके नागरिकता बिल से बाहर रहेंगे। नागालैंड, अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर और मिजोरम में आईएलपी सिस्टम है। केंद्र ने कहा है कि वह मेघालय में भी आईएलपी सिस्टम लाएगी। ऐसे में ये राज्य कैब से अछूते रहेंगे जबकि असम का 33 में 26 जिले दायरे में आ जाएंगे। यही वजह है कि जनवरी महीने में मेघालय, मिजोरम और मणिपुर में विदेशियों के खिलाफ हो रहा प्रदर्शन अब असम स्थानांतरित हो गया है।

7. असम के प्रदर्शन में कितना दम है?
असम का प्रदर्शन इसलिए चिंता का विषय बन रहा है क्योंकि इसमें विद्यार्थी भाग ले रहे हैं। प्रदर्शनकारी सार्वजनिक संपत्तियों को नुकसान पहुंचा रहे हैं। गुवाहाटी, डिब्रूगढ़ और नवगांव में जिंदगी थम सी गई है। राज्य के मुख्यमंत्री सर्वानंद सोनोवाल लोगों को यह समझाने का लगातार प्रयास कर रहे हैं कि नागरिकता बिल के कारण असम की पुरानी समस्या खत्म होने जा रही है और वहां विकास की नई बयार देखने को मिलेगी।


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