राज्यों में बने डिटेंशन सेंटर और जेल में क्या फर्क है? जानें सबकुछ





 





गुवाहाटी/बेंगुलुरु/मुंबई
नागरिकता संशोधन कानून पर पूरे देश में विरोध प्रदर्शनों का दौर अभी जारी है। पीएम नरेंद्र मोदी ने सीएए और एनआरसी को लेकर पिछले दिनों एक सभा में कहा था कि पूरे देश में ये अफवाह फैलाई जा रही है कि मुस्लिमों को कुछ चिह्नित जगहों पर भेज दिया जाएगा। उनके भाषण के बाद, सोशल मीडिया पर निर्माणाधीन डिटेंशन सेंटरों की तस्वीरें पोस्ट की जाने लगीं।

डिटेंशन सेंटर में अवैध अप्रवासियों को रखा जाता है, जिन्हें ट्राइब्यूनल/अदालतें विदेशी घोषित कर देती हैं। या ऐसे विदेशियों को रखा जाता है, जिन्होंने किसी जुर्म में सजा काट ली हो और अपने देश डिपोर्ट किए जाने का इंतजार कर रहे हों। विदेश कानून, 1946 के सेक्शन 3(2)(सी) में केंद्र सरकार के पास भारत में अवैध रूप से रह रहे विदेशी नागरिकों को उनके देश भेजने का अधिकार है। राज्य भी डिटेंशन सेंटर स्थापित कर सकते हैं। यहां, हम आपको वह सारी जानकारी दे रहे हैं, जो आप इसे लेकर जानना चाहते हैं।

डिटेंशन सेंटरों का एनआरसी से क्या लेना देना है?
असम में एनआरसी निवासियों की एक सूची है जिससे ये पहचान की जा सकती है कि कौन यहां का मूल निवासी है और अवैध शरणार्थी का पता लगाया जा सकता है। 2013 में, तमाम रिट याचिकाओं के जवाब में सुप्रीम कोर्ट ने भारत के रजिस्ट्रार जनरल को ये निर्देश दिया कि इस साल 31 अगस्त तक एनआरसी की अपडेट लिस्ट जारी करें। ये प्रक्रिया 2015 में शुरू हुई थी और बीती 31 अगस्त को ये लिस्ट जारी कर दी गई।

इसमें जगह बना पाने में 19.07 लाख आवेदक विफल रहे। एनआरसी लिस्ट में शामिल न हो पाने से ये साबित नहीं होता कि वे सभी विदेशी हो गए। फॉरेनर्स ट्राइब्यूनल के सामने वे अपना मामला रख सकते हैं, जो कि अर्ध सरकारी संस्था है और विशेषतौर पर नागरिकता से जुड़े मामले देखता है। ट्राइब्यूनल के फैसले को हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जा सकती है।

किन राज्यों में हैं डिटेंशन सेंटर?

असम में पहली बार 2005 में तरुण गोगोई की कांग्रेस सरकार ने डिटेंशन सेंटर बनाए थे। 2009, 2012, 2014 और 2018 में सभी राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों के प्रशासन को डिटेंशन सेंटर खोलने के आदेश दिए जा चुके हैं ताकि अवैध रूप से देश में रहनेवाले विदेशी नागरिकों की गतिविधि पर रोक लग सके और डिपोर्टेशन के आदेश के दौरान उनकी मौजूदगी सुनिश्चित की जा सके।

असम में 6 डिटेंशन सेंटर, कर्नाटक में एक
गोलपाड़ा, तेजपुर, जोरहाट, डिब्रूगढ़, सिलचर और कोकराझार। इन्हें जिला जेलों के अंदर ही बनाया गया है, जहां 988 लोगों को रखा जा सकता है। मतिया में सबसे बड़ा डिटेंशन सेंटर बनाया जा रहा है, जहां एक साथ 3000 लोग रखे जा सकते हैं। कर्नाटक में एक सेंटर है। मुंबई में भी एक डिटेंशन सेंटर खोलने की योजना है। इस साल के शुरू में बंगाल सरकार ने भी न्यू टाउन और बोनगांव में डिटेंशन सेंटर खोलने की रजामंदी दे रखी है। गोवा और दिल्ली में भी एक-एक सेंटर हैं।

क्या डिटेंशन सेंटरों को जेल कहा जा सकता है?
सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि जेलों और डिटेंशन सेंटर के बीच अंतर जरूरी है। जेल में अपराध की सजा भुगत रहे लोग रहते हैं, जबकि डिटेंशन सेंटर में लोग फैसले का इंतजार कर रहे होते हैं कि वे देश में रहने पाएंगे या नहीं। केंद्र सरकार ने जनवरी में सभी राज्यों को मॉडल डिटेंशन सेंटर मैन्युअल भेजकर तमाम सुविधाएं स्थापित करने को कहा था। इनमें स्किल सेंटर, बच्चों के लिए क्रेच और पकड़े गए विदेशियों को उनके मिशन/दूतावासों/कौंसुलेट या परिवारों से संपर्क करने के लिए सेल बनाना शामिल था। इस साल मई में सुप्रीम कोर्ट ने डिटेंशन सेंटर में तीन साल बिता चुके लोगों को जमानत पर छोड़ने का आदेश दिया था।



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