सरकार-डॉक्टरों में बात नहीं बनने से रेजिडेंट्स की हड़ताल तीसरे दिन भी जारी, मरीज परेशान


जयपुर. रेजिडेंट्स की प्रदेशव्यापी हड़ताल गुरुवार को लगातार तीसरे दिन भी जारी है। कार्डियो को छोड़कर हड़ताल से एसएमएस में करीब करीब सभी विभागों में काम ठप है। मरीज लगातार तीसरे दिन परेशान होते रहे। ओपीडी 40 और आईपीडी घटकर 50 प्रतिशत रह गई है। सुबह तक 43 ऑपरेशन टाले गए। उधर, हड़ताल जानलेवा साबित हुई है। कोटा में हड़ताल के कारण एक मरीज की जान चली गई। तीन मांगों को लिखित में देने के रवैये पर अड़े रेजीडेंट्स हड़ताल जारी रखे हुए हैं।


रेजीडेंट्स की तीन प्रमुख मांगों में हॉस्टल में कमरा नहीं उपलब्ध नहीं होने पर अन्य राज्यों की तर्ज पर आवासीय भत्ता देने, हाल ही में बढ़ाई गई पीजी और सुपर स्पेशीलिटी की फीस का आर्डर वापस हो और चिकित्सकों के लिए अस्पतालों में पुख्ता सुरक्षा व्यवस्था उपलब्ध कराना है। सरकार ने इन मांगों पर हामी भर दी है लेकिन रेजीडेंट्स का कहना है कि उन्हें लिखित में ही चाहिए। वहीं चिकित्सा मंत्री रघु शर्मा ने कहा है कि सरकार स्तर पर काम करने की प्रक्रिया होती है और उसमें समय लगता है।


सरकार ने चेताया- हम संवेदनशील... लेकिन मजबूर नहीं
मंत्री रघु शर्मा ने कहा कि सरकार में हर काम को पूरा करने की एक प्रक्रिया होती है। चेतावनी दी, मुद्दों पर सरकार संवेदनशील है, लेकिन मजबूर भी नहीं है। यदि रेजिडेंट इसी तरह हठधर्मिता पर अड़े रहे तो सख्त कदम उठाए जाएंगे। लेकिन कब क्या कदम उठाए जाएंगे, इस पर सरकार की ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई। वहीं बुधवार को प्रदेशभर में रेजीडेंट्स के हड़ताल की वजह से 450 से अधिक ऑपरेशन टाल दिया गए। ओपीडी और आईपीडी भी घटकर 40 फीसदी तक रह गई है। इन सब के बीच सवाल यह कि निष्कर्ष सरकार और रेजीडेंट्स स्तर पर ही निकलना है तो फिर हठधर्मिता की देरी से मरीजों की जिंदगी से क्यों खेला जा रहा है।


कोटा में गई 50 साल के हरिशंकर की जान


रेजीडेंट डॉक्टरों की हड़ताल बुधवार को एक मरीज के लिए जानलेवा साबित हो गई। इस रोगी का समय पर सीपीआर तक नहीं हो पाया और सांसें टूट गई। मामला एमबीएस का है। कुन्हाड़ी के हरिशंकर शर्मा (50) को सुबह चेस्ट पेन होने पर परिजनों ने अस्पताल में एडमिट कराया था। इमरजेंसी मेडिसिन वाॅर्ड में उनका करीब 4 घंटे तक इलाज चला, इसके बाद परिजन उन्हें दूसरे अस्पताल ले जाने लगे।


दूसरे अस्पताल ले जाते वक्त सांसें उखड़ीं


मरीज को अस्पताल गेट पर लाकर एंबुलेंस में शिफ्ट किया जा रहा था, तभी वह निढाल हो गए। परिजन फिर उन्हें वाॅर्ड में लेकर आए तो स्टाफ ने डॉक्टरों को कॉल किया। वाॅर्ड से कॉल करने के 26 मिनट बाद मेडिसिन विभाग के सीनियर डॉक्टर आए और रोगी का सीपीआर शुरू किया, लेकिन तब तक काफी देर हो चुकी थी। आखिरकार मरीज को मृत घोषित कर दिया।


समय से सीपीआर होता तो जान बच जाती


परिजन का कहना था कि हम रोगी को 11:49 बजे वॉर्ड में ले आए थे, लेकिन 12:15 बजे तक कोई डॉक्टर नहीं आया। इस अवधि में यदि सीपीआर होता तो शायद जान बच सकती थी। परिजन सूरज व दीपक ने बताया कि जब सबसे बड़े अस्पताल की इमरजेंसी में यह हाल है तो सामान्य स्थिति में क्या होता होगा? डॉक्टरों की हड़ताल का मतलब यह नहीं कि आप गंभीर मरीज को मरने के लिए छोड़ दो। 


यही हाल रहा तो कई मरीजों की जान पर बन सकती है


न्यूरोसर्जरी, नेफ्रोलॉजी जैसे विभागों में मरीज को हर दिन इलाज का इंतजार रहता है। ऑपरेशन, इलाज और डायलिसिस टल रहा है। यही स्थिति 1-2 दिन और रही तो कई मरीजों की जान जा सकती है।


मंत्री का जवाब- लिखित के लिए एक प्रोसेस होता है :
चिकित्सा मंत्री रघु शर्मा ने कहा- रेजीडेंट्स की मांगें मान ली हैं, लेकिन लिखित के लिए एक प्रोसेस होता है, समय लगता है। उन्हें तुरंत हड़ताल खत्म करनी होगी, अन्यथा सख्त कदम उठाएंगे।


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