शांति से धरना-प्रदर्शन मौलिक अधिकार पर सरकार लगा सकती है वाजिब रोक, समझिए कानूनी बात


नई दिल्ली
धरना-प्रदर्शन करना संवैधानिक अधिकार है। विचारों की अभिव्यक्ति के तहत देश के हर नागरिक को यह अधिकार मिला है। कानून के दायरे में शांतिपूर्ण तरीके से धरना-प्रदर्शन की इजाजत है लेकिन वाजिब रोक का भी प्रावधान है। कानूनी जानकार बताते हैं कि कानून के दायरे में शांतिपूर्ण धरना-प्रदर्शन का अधिकार लोकतांत्रिक और संवैधानिक अधिकार है लेकिन इससे दूसरे का अधिकार प्रभावित नहीं होना चाहिए। धरना-प्रदर्शन की आड़ में हिंसा की इजाजत नहीं है।


सुप्रीम कोर्ट के फैसले क्या कहते हैं
सुप्रीम कोर्ट ने समय-समय पर दिए फैसलों में कहा है कि लोकतांत्रिक देश में आवाज उठाने का अधिकार बेहद अहम है लेकिन जरूरत पड़ने पर सरकार इसमें वाजिब रोक भी लगा सकती है। संविधान के अनुच्छेद-14 से 32 के बीच मूल अधिकारों का प्रावधान किया गया है। इसके तहत समानता का अधिकार दिया गया है यानी कानून के सामने सबको बराबर माना गया है। लिंग, जाति, धर्म या फिर क्षेत्र के आधार पर किसी के साथ कोई भेदभाव नहीं किए जाने का प्रावधान है। साथ ही 'राइट टु फ्रीडम' का अधिकार मिला हुआ है। इसमें विचार अभिव्यक्ति के अधिकार शामिल हैं। इसके तहत कोई भी शख्स कानून के दायरे में धरना, प्रदर्शन या फिर भाषण आदि दे सकता है। अनुच्छेद-19 के तहत हर नागरिक को विचार और अभिव्यक्ति का अधिकार मिला हुआ है।

प्रतिबंध की भी बात करता है संविधान
ऐडवोकेट करण सिंह बताते हैं कि धरना-प्रदर्शन का अधिकार मौलिक अधिकार के तहत निहित है लेकिन यह अधिकार पूर्ण नहीं है। यानी जैसे ही दूसरे के अधिकार प्रभावित होने लगे, आपका अधिकार सीमित हो जाता है। कानून के दायरे में धरना-प्रदर्शन हो सकता है लेकिन इस दौरान कोई कानून अपने हाथ में नहीं ले सकता। मसलन, अगर कोई रास्ता रोकता है तो दूसरे का अधिकार प्रभावित होता है।


अगर कोई आगजनी या हिंसा करता है तो यह गैरकानूनी है। ऐसे शख्स पर कानूनी कार्रवाई हो सकती है। धरना-प्रदर्शन मौलिक अधिकार है लेकिन सरकार वाजिब रोक लगा सकती है। अगर कोई शख्स सोशल मीडिया या किसी और तरह से अफवाह फैलाता है, दो समुदाय में नफरत पैदा करता है तो उसके खिलाफ आईपीसी की धारा-153 और 153-ए के तहत केस दर्ज किए जाने का प्रावधान है। 


दूसरे का अधिकार प्रभावित न हो
दिल्ली हाई कोर्ट के रिटायर्ड जस्टिस एस. एन. ढींगड़ा बताते हैं कि भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में धरना-प्रदर्शन का अधिकार विचार अभिव्यक्ति के अधिकार में निहित है। अनुच्छेद-19 (1) के तहत विचार अभिव्यक्ति का अधिकार है। इसके तहत कोई भी नागरिक अपनी आवाज उठाने के लिए धरना-प्रदर्शन कर सकता है लेकिन यह धरना-प्रदर्शन कानून के तहत होना चाहिए। यानी अगर किसी इलाके में मैजिस्ट्रेट ने निषेधाज्ञा यानी धारा 144 लगा रखी है तो वहां धरना प्रदर्शन नहीं हो सकता। मैजिस्ट्रेट धारा-144 लगा सकता है। अगर कोई इसका उल्लंघन करता है तो पुलिस उस पर कार्रवाई कर सकती है। साथ ही सरकार द्वारा तय इलाके में धरना और प्रदर्शन हो सकता है, जिस इलाके में इसकी मनाही है वहां प्रदर्शन नहीं हो सकता। विचार अभिव्यक्ति का अधिकार पूर्ण नहीं है बल्कि संविधान के अनुच्छेद-19(2) में वाजिब प्रतिबंध है और इसके तहत सरकार धरना प्रदर्शन को सीमित कर सकती है या फिर उस पर रोक लगा सकती है।


कोर्ट ने कहा था- सरकार लगा सकती है वाजिब रोक
सुप्रीम कोर्ट ने इस संदर्भ में 23 जुलाई 2018 को एक महत्वपूर्ण फैसला दिया था। कोर्ट ने जंतर-मंतर पर धरना और प्रदर्शन की इजाजत देते हुए अथॉरिटी से कहा था कि वह इस बात को सुनिश्चित करे कि धरना और प्रदर्शन के दौरान वहां रहने वाले आम शहरी को परेशानी न हो और उनके अधिकार प्रभावित न हों। अदालत ने तब कहा था कि कानूनी तरीके से विरोध करना लोकतंत्र की विशिष्ट पहचान है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि धरना और प्रदर्शन का अधिकार मौलिक अधिकार है लेकिन साथ ही इसमें सरकार वाजिब रोक भी लगा सकती है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि अभिव्यक्ति के अधिकार अहम हैं। सवाल यह नहीं है कि प्रदर्शन न्यायसंगत है या नहीं है बुनियादी सवाल ये है कि प्रभावित लोगों का अधिकार है कि वह लोकतंत्र में आवाज उठा सकते हैं।


16 नवंबर 2017 को दिए एक अन्य फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि विचार अभिव्यक्ति का अधिकार पवित्र और अटल है और सामान्य तौर पर इसमें दखल नहीं दिया जा सकता। सुप्रीम कोर्ट ने 9 अगस्त 2018 को दिए अपने फैसले में कहा था कि प्रत्येक नागरिक को शांतिपूर्ण तरीके से प्रदर्शन और विरोध जताने का अधिकार है। लेकिन हिंसा या हिंसक स्थिति पैदा कर इसकी इजाजत नहीं दी जा सकती।

मौलिक अधिकार के उल्लंघन में रिट का रास्ता
मौलिक अधिकार के उल्लंघन के मामले में हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया जा सकता है। इसके लिए संविधान के अनुच्छेद-32 के तहत सुप्रीम कोर्ट में और अनुच्छेद-226 के तहत हाई कोर्ट में याचिका दायर करने का अधिकार है। याचिकाकर्ता को अदालत को यह बताना होता है कि उसके मूल अधिकार का कैसे उल्लंघन हो रहा है? अगर किसी अन्य व्यक्ति या समाज में लोगों के मूल अधिकार का उल्लंघन हो तो भी रिट दाखिल की जा सकती है। निचली अदालत में रिट दाखिल नहीं की जा सकती। आम आदमी के मूल अधिकार के उल्लंघन के मामले में पीआईएल दायर की जाती है।


Popular posts
क्या सुहागरात पर होने वाला सेक्स सहमति से होता है?
Image
कोरोना लॉकडाउन में जरूरतमंद गरीब परिवारों को राहत 1000 रुपयों के बाद 1500 रुपये की और मिलेगी सहायता
Image
गहलोत बोले- धार्मिक आधार पर लोगों को देश से बाहर करने के लिए सरकार खुद अफवाह फैला रही
Image
चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग पर्याप्त मात्रा में वेंटिलेटर एवं टेस्ट किट का इंतजाम करके रखें-हैल्थ केयर वर्कर्स हमारे अग्रिम योद्धा-बुजुर्गों का विशेष ध्यान रखा जाए-मुख्यमंत्री -अशोक गहलोत-
Image
निर्भया कांड के दोषी की दया याचिका गृह मंत्रालय को मिली, जल्द भेजी जाएगी राष्ट्रपति के पास
Image