जीडीपी गणना का सिस्टम सुधारेगी सरकार


नई दिल्ली
केंद्र सरकार को अर्थव्यवस्था के आंकड़ों की सत्यता पर काफी आलोचना झेलनी पड़ रही है। साथ ही, यह इससे छेड़छाड़ करने के आरोप भी लगते रहते हैं। ऐसे में मोदी सरकार ने अर्थव्यवस्था के आधिकारिक आकलन के तरीके में बदलाव लाने पर चर्चा कर रही है। चर्चा का मूल मुद्दा है कि आर्थिक गतिविधियों का ज्यादा सटीक तरीके से आकलन कैसे किया जाए, खासकर अव्यवस्थित क्षेत्र की गतिवधियों का। इसी क्रम में अत्याधुनिक तकनीक के उपयोग से आकलन का आधार बदलने की प्रक्रिया पर भी गंभीर मंथन हो रहा है।

नीति आयोग, सांख्यिकी मंत्रालय और दूसरी सरकारी एजेंसियों ने आधिकारिक आंकड़ों की गुणवत्ता सुधारने के लिए कुछ खामियां तुरंत दूर करने का सुझाव दिया था जिसके बाद सरकार ने यह पहल की है। पिछले कुछ वर्षों से सरकार को इसी मुद्दे पर राजनीतिक आक्षेपों का सामना करना पड़ रहा है। विपक्षी दल और कुछ विशेषज्ञ मोदी सरकार में जीडीपी ग्रोथ के ऊंचे आंकड़ों को शक की निगाह से देख रहे हैं।


खामियां दूर करने का सुझाव
पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यन ने दावा किया कि वास्तविक जीडीपी ग्रोथ आधिकारिक आंकड़े से 2.5% कम है। हालांकि, आलोचनाओं को ज्यादा बल नहीं मिल पाया क्योंकि आर्थिक सुस्ती का असर आधिकारिक आंकड़ों में भी देखा गया और उलटा सुब्रमण्यन पर ही सवाल उठ गया। हालांकि, सरकार को महसूस हुआ कि उसे आधिकारिक आंकड़े पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है।

सेवा क्षेत्र के आंकड़े जुटाने में गड़बड़ी
मसलन, सेवा क्षेत्र की ज्यादातर गतिविधियां, जिनका देश की जीडीपी में आधा का योगदान होता है, मूलतः औपचारिक क्षेत्र के संस्थानों के आउटपुट के आधार पर ही मापी जाती हैं जबकि इनका दायरा पूरे क्षेत्र के एक चौथाई हिस्से से कुछ ही ज्यादा तक सीमित है। 11 लाख सक्रिय भारतीय कंपनियों में से सात लाख कंपनियां सर्विस सेक्टर की हैं। परिवहन और रेस्त्रां जैसे अनुभागों (सेंगमेंट्स) में स्थिति और भी खराब है क्योंकि इनकी आर्थिक गतिविधियों का आकलन बमुश्किल 15% संस्थानों के आंकड़ों पर आधारित होता है जो औपचारिक क्षेत्र के हैं। चीनी जैसे कुछ क्षेत्रों में उत्पादन का आकलन औसत उत्पादन आंकड़े पर निर्भर है जो तीन दशक पुराना है।

कृषि क्षेत्र के आकलन में भी सुधार की दरकार
जब बात कृषि उत्पाद की कीमतों की गणना की आती है तो एजेंसियां 'फार्म गेट प्राइसेज' पर निर्भर हो जाती हैं जो सरकारी अर्थशास्त्रियों की नजर में दोषपूर्ण हैं। उनका कहना है कि अब विभिन्न कृषि उत्पादों की मंडी दरें जानना संभव है क्योंकि ये ऑनलाइन उपलब्ध होती हैं। साथ ही डिजिटलाइजेशन की प्रक्रिया तेजी से आगे बढ़ रही है जिससे भविष्य में मंडी दरों के आंकड़े जुटाने में और आसानी ही होगी। इसी तरह, जब बात कृषि उत्पादन में पानी की लागत की कीमत के आकलन के लिए सरकार बजट खर्च के आंकड़े पर निर्भर रहती है जबकि इसके लिए चालू ट्यूबवेल्स को बिजली आपूर्ति को आधार बनाने की जरूरत है।

गड़बड़ी के ये भी उदाहरण
औपचारिक क्षेत्र की आर्थिक गतिविधयों के आकलन में कंपनी मामलों के मंत्रालय के आंकड़े विश्वसनीय माने जाते हैं, लेकिन सूत्रों का कहना है कि जब पूंजी निर्माण या कुछ अन्य वित्तीय पैमानों की बात आती है जहां पर्याप्त आंकड़ों का अभाव होता है तो तस्वीर बदल जाती है। मसलन, जमीन की कीमत या पेड-अप कैपिटल अक्सर बाजार मूल्य को प्रदर्शित नहीं करते हैं। खासकर तब जब कोई संस्था वर्षों से कारोबार कर रही हो। पेड-अप कैपिटल वह रकम होती है जो कंपनी को अपने शेयर बेचने के बाद शेयरधारकों से मिलती है।

रंगराजन कमिटी का सुझाव और सरकार
सूत्रों का कहना है कि सी रंगराजन कमिटी ने अटल बिहार वाजपेयी सरकार को अपनी रिपोर्ट सौपीं थी, लेकिन सरकारें इसे लागू करने में असफल रहीं। कमिटी ने भी आंकड़ों की खामियों की तरफ इशारा किया था और कुछ कदम उठाने के सुझाव दिए थे। लेकिन 19 वर्षों के बाद भी सरकार समिति की रिपोर्ट के बड़े हिस्से पर ध्यान नहीं दे सकी।

संसाधनों का अभाव मुख्य चिंता: सेन
इसी तरह देश के पहले मुख्य सांख्यिकीविद प्रणब सेन कुछ समस्याओं के लिए संसाधनों के अभाव का भी दोष देते हैं। उन्होंने कहा, 'रंगराजन कमिटी की कई सिफारिशों को लागू किया गया है।' उन्होंने आगे कहा, 'आपको मैनपावर की जरूरत है। सरकार में अतिरिक्त संसाधन पाना बड़ी समस्या है।' सेन बाद में राष्ट्रीय सांख्यिकी आयोग के चेयरमैन भी बने।अभी वह आंकड़ों में सुधार के लिए गठित समिति की अध्यक्षता कर रहे हैं।


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