दिल्ली में ध्रुवीकरण? कांग्रेस पर मंडरा रहा सूपड़ा साफ होने का खतरा


नई दिल्ली
पिछले विधानसभा चुनाव में खाता न खोल पाने वाली देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी कांग्रेस के सामने एक बार फिर खराब प्रदर्शन का खतरा मंडरा रहा है। प्रदेश कांग्रेस के नेता आपसी बातचीत में मान रहे हैं कि विधानसभा की 70 सीटों में इस बार कुछ एक को छोड़ लगभग सभी जगह आम आदमी पार्टी (आप) और बीजेपी के मुकाबले वह संघर्ष में ही नहीं है। उल्लेखनीय है कि कुछ दिन पहले पार्टी के वरिष्ठ नेता कपिल सिब्बल ने माना था कि कांग्रेस अपने दम पर सरकार नहीं बना सकती, लेकिन सरकार बनाने में इसका अहम रोल हो सकता है।


सूत्रों के मुताबिक, नागरिकता संशोधन कानून (CAA) विरोधी प्रदर्शनों का खुलकर समर्थन कर रही कांग्रेस को उम्मीद थी कि उसे मुस्लिम वोटरों का भरपूर समर्थन मिलेगा और ऐसे में वह पिछले चुनाव के मुकाबले बेहतर प्रदर्शन करेगी, लेकिन अब बीजेपी और आप के बीच तीखी बयानबाजी से बन रहा कथित ध्रुवीकरण की स्थिति में उसे नुकसान का डर सता रहा है। कुछ समय पहले तक कांग्रेस के लिए संभावना वाली सीटें बताई जा रही करीब आधा दर्जन विधानसभा सीटों में पार्टी के नेताओं ने नाम न जाहिर करने की शर्त पर यह स्वीकार किया कि जमीनी स्तर पर कुछ हफ्ते पहले वाले उत्साह की अब कमी है। उन्होंने कहा कि इसकी वजह शाहीन बाग के प्रदर्शन और बीजेपी व नेताओं की तल्ख बयानबाजी से बने सियासी हालात हैं। दिल्ली कांग्रेस के एक सीनियर लीडर ने कहा, 'निश्चित तौर पर इस धारणा को लगातार बल मिल रहा है कि ध्रुवीकरण के कारण दिल्ली का चुनावी मुकाबला द्विदलीय हो गया है। शायद इससे हमें नुकसान हो।'

इसलिए प्रचार से दूर बड़े नेता
पार्टी के चुनाव प्रबंधक भी यह मान रहे हैं कि हालात को ध्यान में रखते हुए ही कांग्रेस के बड़े नेताओं को प्रचार अभियान में नहीं उतारा गया है। प्रदेश कांग्रेस के एक नेता ने कहा, एक तो हमारी हालत अच्छी नहीं है और दूसरा सभी (गैर भाजपा ताकतें) मान रहे हैं कि कांग्रेस यदि आक्रामक होगी तो उससे बीजेपी को ही फायदा होगा। अब तक कांग्रेस के शीर्ष नेताओं सोनिया गांधी, राहुल गांधी व प्रियंका गांधी वाड्रा ने दिल्ली में चुनावी सभा से परहेज किया है और तीनों शायद मतदान के ठीक पहले ही प्रचार में उतरेंगे।

चाको को चौंकाने की उम्मीद
वैसे, पार्टी के दिल्ली प्रभारी पीसी चाको का दावा है कि पार्टी चौंकाने वाले नतीजे देगी और चुनाव प्रचार के आखिरी दिनों में सभी शीर्ष नेता जनता के बीच होंगे। चाको ने कहा, 'यह धारणा बनाई जा रही है कि आप और बीजेपी के बीच मुकाबला है। जबकि बीजेपी की हालत बहुत खराब है। सोचिए, अमित शाह हर जगह रोड शो कर रहे हैं। कांग्रेस की स्थिति बीजेपी से बेहतर है और हम केजरीवाल को चुनौती दे रहे हैं।'

उधर, शीला दीक्षित के नेतृत्व में 15 साल तक सत्ता में रही कांग्रेस को पिछले विधानसभा चुनाव में कोई सीट नहीं मिली थी और उसे करीब 10 प्रतिशत वोट मिले थे। हालांकि 2019 में हुए लोकसभा चुनाव में उसे 22.46 फीसदी वोट मिले थे और वह दूसरे स्थान पर रही थी।

सिर्फ 5 सीटों पर जीतने को चुनाव?
विधानसभा चुनावों की स्ट्रैटजी और मैनेजमेंट से जुड़े प्रदेश कांग्रेस के नेता ने कहा कि पार्टी मुश्किल से पांच या छह विधानसभा क्षेत्रों में ही ठीक से चुनाव लड़ रही है। सूत्रों के मुताबिक जिन सीटों पर कांग्रेस की मौजूदगी दिख रही है उनमें ओखला, बल्लीमारान, सीलमपुर और मुस्तफाबाद की सीटें शामिल हैं। बता दें कि इन सीटों पर मुस्लिम मतदाता निर्णायक भूमिका में हैं। इनके अलावा पार्टी गांधीनगर और बादली जैसे क्षेत्रों में भी खुद को लड़ाई में मान रही है। ओखला इलाके में सोशल ऐक्टिविस्ट मोहम्मद अहमद कहते हैं, 'कुछ हफ्ते पहले तक यहां कांग्रेस की स्थिति मजबूत थी, लेकिन अब यहां के लोगों में यह माहौल बनता दिख रहा है कि वह बीजेपी विरोधी वोटों का बंटवारा नहीं करेंगे। ऐसी स्थिति में कांग्रेस के लिए यहां से जीतना काफी मुश्किल नजर आ रहा है।'

वहीं, ओखला से कांग्रेस ने अपने वरिष्ठ नेता व पूर्व सांसद परवेज हाशमी को उम्मीदवार बनाया है। प्रदेश में संशोधित नागरिकता कानून के खिलाफ धरना प्रर्दशन का केंद्र बना शाहीन बाग इसी विधानसभा क्षेत्र के अंतर्गत आता है। इसी तरह, सीलमपुर विधानसभा सीट पर भी पांच बार के विधायक रहे मतीन अहमद की उम्मीदवारी के मद्देनजर खुद को मजबूत मानकर चल रही कांग्रेस के लिए मतदान से कुछ दिनों पहले तक हालात मुश्किल नजर आ रहे हैं।