हिमस्खलन में दबे, कर्ज के दलदल में भी फंसे...फिर भी न टूटे और माउंट एवरेस्ट किया फतह


करीब 5 साल पहले नेपाल में आए विनाशकारी भूकंप में मौत को मात देने वाले पर्वतारोही बृजमोहन शर्मा (ब्रीज शर्मा नाम से मशहूर) के बारे में बहुत कम लोग जानते हैं कि वह अल्ट्रा मैराथन रनर भी हैं। 46 वर्ष के बृज इंडियन नेवी में कार्यरत हैं और पहले भारतीय हैं, जिन्होंने माउंट एवरेस्ट को फतह करने के अलावा दुनिया की सबसे कठिन अल्ट्रा मैराथन रेस में से एक बैडवॉटर 135 और ब्राजील 135 रेस को पूरा किया है। अकल्पनीय सी दिखने वाली ये तीनों कामयाबियां हासिल करना चट्टान की तरह मजबूत इरादे रखने वाले इंसान के बस की ही बात है।


बृज मजबूत इरादों वाले इंसान हैं और जो काम करने की एक बार ठान लेते हैं, उसे पूरा करके ही दम लेते हैं। 46 वर्षीय इस मुंबईकर का अगला मिशन है ऑस्ट्रेलिया के पर्थ में होने वाली डिलिरियस वेस्ट रेस। यह 350.7 किलोमीटर की है और इसे फिनिश करने की समय सीमा 104 घंटे है। पिछले साल भी बृज ने इस रेस में हिस्सा लिया था और इसे 95 घंटे और 39 मिनट में पूरा किया था। इस बार शर्मा का इरादा इस रेस को 80 घंटे से कम में पूरी करने का है। 


2015 में बृज ने माउंट एवरेस्ट फतह करने की कोशिश की, लेकिन भूकंप आ जाने के कारण नाकाम रहे। वह भूकंप के कारण हुए हिमस्खलन में दब गए, लेकिन जीवित बच गए। हालांकि जब वह घर लौटे, तो उन पर भारी भरकम कर्ज का बोझ हो गया था। स्पॉन्सर्स से कोई फंड नहीं मिलने से बृज की परेशानियां और बढ़ गईं। इस आर्थिक संकट से उबरने में उन्हें काफी वक्त लगा। शर्मा ने 2016 में अल्ट्रा मैराथन में शानदार वापसी की और अमेरिका में बेहद गर्म मौसम में होने वाली बैडवॉटर 135 अल्ट्र मैराथन (217 किमी) रेस को फिनिश करने वाले दूसरे भारतीय बने। उन्होंने यह रेस 40 घंटे और 47 मिनट में पूरी की और वह यह रेस पूरी करने वाले सबसे तेज भारतीय बने। यही नहीं, 2017 में दूसरे प्रयास में वह माउंट एवरेस्ट पर भी जा पहुंचे। 


बृज का जन्म वर्ष 1974 में राजस्थान के जयपुर में हुआ। 15 वर्ष की उम्र में मुंबई आने के कुछ वर्षों बाद वह इंडियन नेवी का हिस्सा बने। वह इंडियन नेवी के एडवेंचर सेल के भी कई सालों तक इंचार्ज रहे। इस दौरान उन्होंने हिमालय की वादियों और पश्चिमी घाट में कई कैंप लगाने के अलावा 12,000 फीट से अधिक की ऊंचाई वाले पर्वतों पर एक दर्जन से ज्यादा बार चढ़ाई करने के मिशन की अगुवाई की। पर्वतारोहण से रनिंग की तरफ झुकाव कैसे हुआ, इस बारे में बृज ने एक बड़ा रोचक किस्सा सुनाया। नेवी में नौकरी के दौरान वह नेवी में ही कार्यरत सुरेश पिल्लै के संपर्क में आए, जिन्होंने बृज को मैराथन दौड़ने के लिए प्रेरित किया। 


लिरियस वेस्ट रेस भी कम कठिन रेस नहीं है। रेस के दौरान रनर को पहाड़ी रास्तों से ही नहीं, बल्कि जंगलों में से होकर गुजरना होता है। यहां तक कि रात में भी। इतना ही नहीं, कभी कभार ऐसे इलाकों से भी पाला पड़ता है, जहां इंसान तो छोड़ो पशु-पक्षियों तक का नामो-निशान नहीं होता। ये जरूर है कि हर 20 किमी पर एक कैंप होता है, जिसमें पानी और अन्य जरूरी सामान और चिकित्सकीय मदद उपलब्ध रहती है। डिलिरियस वेस्ट रेस के अपने पिछले अनुभव के बारे में बृज ने कहा, 'मैं कई बार तय रास्ते से भटक गया। एक दफा तो मुझे तय रास्ते पर आने में 4 घंटे तक लग गए। अगर ऐसा नहीं हुआ होता, तो रेस और कम समय में फिनिश कर पाता।' 


बृज ने हिम्मत नहीं हारी और अगले साल जनवरी में मुंबई मैराथन 4 घंटे और 31 मिनट में फिनिश करने के बाद अक्टूबर में अपनी पहली अल्ट्रा मैराथन (80 किमी भट्टी लेक्स अल्ट्रा) और दिसंबर में नीलगिरी की वादियों में 100 किमी की अल्ट्रा मैराथन दौड़ी। बृज को तब अहसास हो गया कि अल्ट्रारनिंग ही वह तरीका है, जिससे वह अपनी शारीरिक क्षमताओं को चुनौती दे सकते हैं। बृजमोहन शर्मा कहते हैं, रनिंग से मुझे खुशी और संतुष्टि दोनों मिलती हैं। यह एक ऐसा खेल है, जिसमें कम से कम संसाधनों की जरूरत पड़ती है। कोई भी इंसान रनिंग करना शुरू कर सकता है। इंसान को जब भी वक्त मिले, उसे दौड़ना चाहिए। जीवन में कुछ बनने के लिए समय प्रबंधन बेहद जरूरी है। 


पिल्लै ने बृज को बिना बताए वर्ष 2012 में हुई वसई विरार मेयर्स मैराथन के लिए उनका नाम रजिस्टर करवा दिया और रेस की एक रात पहले उन्हें इसकी जानकारी दी। बृज कहते हैं, 'इस मैराथन से पहले मैंने जिंदगी में इस तरह की किसी रेस में हिस्सा नहीं लिया था। खैर, मैं मेयर्स मैराथन में दौड़ा और 5 घंटे और 38 मिनट में रेस पूरी की। रेस फिनिश करने में काफी लंबा वक्त लगा और यहां तक कि आयोजकों ने मुझे फिनिशर मेडल तक नहीं दिया। मुझे यह अपना नहीं, बल्कि पिल्लै सर का अपमान लगा, जिन्होंने मुझ पर इतना भरोसा जताया था।' 


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