मीर मुश्ताक अहमद: जब दिल्ली ने बनाया था मुसलमान को 'सीएम'


नई दिल्ली
मीर मुश्ताक अहमद 1972-1977 के दौरान दिल्ली के मुख्य कार्यकारी पार्षद रहे। अगर तब विधानसभा होती तो वे यहां के पहले मुस्लिम मुख्यमंत्री होते। वैसे इस पद को सीएम के बराबर ही माना जाता है और पावर भी वैसी ही होती थीं। वे दिल्ली की पहली विधानसभा में कूचा चेलान सीट से प्रजा सोशलिस्ट पार्टी की टिकट पर जीते थे। बेहद ओजस्वी वक्ता मीर ने कभी अपने सिद्धांतों के साथ समझौता नहीं किया।


जिन्ना को बोलने नहीं दिया था मीर ने
मीर मुश्ताक अहमद ने 1940 से कुछ पहले मोहम्मद अली जिन्ना को तब बोलने नहीं दिया था जब जिन्ना ने अपनी तकरीर में सांप्रदायिकता का रंग घोलना चालू कर दिया था। जिन्ना दरियागंज में एक सभा को संबोधित करने आए थे। वहां पर मीर मुश्ताक अहमद और उनके तमाम साथी भी थे। उन्हें सांप्रदायिकता किसी भी स्तर पर नामंजूर थी। वे लंबे समय तक जनता कोऑपरेटिव बैंक के चीफ भी रहे। उनका जीवन सादगी की मिसाल था। वे चौबीस घंटे जनता की सेवा में जुटे रहते थे। स्वाधीनता सेनानी मीर साहब ने देश की आजादी के बाद प्रजा सोशलिस्ट पार्टी का दामा था। पर वे कुछ समय के बाद वापस कांग्रेस में वापस आ गए थे।

तब दिल्ली वोट देती थी 'कश्मीरी मम्मी' को
दिल्ली की सियासत में लगभग आधी सदी तक सक्रिय रहीं ताजदार बाबर मिन्टो रोड सीट से तीन बार विधायक रहीं और कई बार बाराखंबा रोड सीट से महानगर पार्षद भी निवार्चित हुईं। उन्हें सब मम्मी जी कहते हैं। इन दोनों सीटों पर 80 फीसद वोटर गैर-मुसलमान रहे हैं। शायद ही उनसे ज्यादा किसी ने राजधानी में शराब के ठेकों को स्कूलों या आवासीय बस्तियों में बंद करवाने के लिए धरने-प्रदर्शनों में भाग लिया हो।


ताजदार बाबर कश्मीरी हैं। उन्होंने शादी की थी डब्ल्यू. एम. बाबर नाम के एक पठान से। बाबर 1947 में पेशावर से सपरिवार दिल्ली आ गए थे। उन्होंने इस्लामिक पाकिस्तान के बजाय गांधी के भारत में रहना पसंद किया। यहां आकर वो आकाशवाणी में नौकरी करने लगे। उन्होंने ही आकाशवाणी की पश्तो सेवा शुरू की। फिर उनका श्रीनगर तबादला हुआ। वहां पर उनकी शादी ताजदार जी से हुई। ताजदार बाबर पति के साथ 50 के दशक में दिल्ली आ गईं। यहां पर कांग्रेस पार्टी से जुड़ गईं। अब लगभग 84 साल की हो गई हैं।