प्रशांत किशोर ने नीतीश को 'फेल' तो बताया लेकिन पास होने का फॉर्म्युला कहां?


दिल्ली
नेता निर्माण की प्रक्रिया से गुजर रहे प्रशांत किशोर ने मंगलवार को पटना में अपने राजनीतिक भविष्य का खाका खींचा। चुनाव रणनीतिकार से नेता बन रहे प्रशांत किशोर किसी टीवी डिबेट पर बैठे विपक्ष के नेता की तरह दिखाई दे रहे थे। वो मुख्यमंत्री नीतीश कुमार में हर वो बुराई बताई रहे थे जो पार्टी से निकाले जाने के बाद किसी नेता को नजर आने लगती है। मानो वो बिहार विधानसभा में नीतीश सरकार के कामकाज का श्वेत पत्र जारी कर रहे हों। बतौर नेता पीके असहज भी थे और आत्मविश्वास की कमी भी दिख रही थी।


जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू) से निकाले जाने के बाद प्रशांत किशोर के अगले कदम का इंतज़ार लंबे समय से हो रहा था। पहले 11 को वो ऐलान करने वाले थे। बाद में इसे 18 फरवरी कर दिया। मतलब उस मंगलवार के बदले इस मंगलवार का शुभ दिन उन्हें मुफीद लगा। मंगलवार को ही दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल के साथ उनकी तस्वीर सामने आई थी। उस दिन दिल्ली में आम आदमी पार्टी की बड़ी जीत हुई थी। 


लेकिन प्रशांत किशोर ने जो खाका रखा उसमें कोई दम नहीं था। वो संशय में थे। पीके ने कहा कि चुनाव नहीं लड़ेंगे। नेता चुनाव लड़ने से परहेज करे तो समझिए बुनियादी दिक्कत है। उन्होंने अपनी संस्था इंडियन पॉलिटिकल एक्शन कमिटी का जिक्र कर बताया कि लाखों युवा उनसे जुड़े हुए हैं। प्रशांत किशोर ने कहा कि वो 'बात बिहार की' कार्यक्रम के जरिए पंचायत कर पहुंचेंगे। जिस दिन एक करोड़ बिहारी युवा कनेक्ट हो गए उस दिन बताएंगे कि राजनीतिक पार्टी लॉंच की जाए या नहीं। मतलब कनफ्यूजन पूरा है।

प्रशांत किशोर को शायद नहीं मालूम की अमित शाह की अगुआई में बीजेपी का संगठन हर बूथ पर पन्ना प्रमुख साल भर पहले बना चुका है। बिहार में बीजेपी के 90 लाख तो सिर्फ प्राथमिक सदस्य हैं। अगर बूथ लेवल तक पहुंच को काउंट करें तो संख्या कहीं अधिक हो जाएगी। इसलिए जिस बुनियाद का सपना संजोकर पीके बिहार की राजनीति के महारथियों से लोहा लेने उतरे हैं, उसके बारे में खुद भी आश्वस्त नहीं हैं।

नीतीश को फेल बताया लेकिन पास होने का फॉर्म्युला नहीं बताया

प्रशांत किशोर ने सामाजिक और आर्थिक सूचकांक गिनाए। हर मोर्चे पर नीतीश कुमार को फेल बताया। उनका कहना था, "लड़कियों को फ्री साइकल मिल गई लेकिन शिक्षा बर्बाद हो गई, बिजली पहुंच गई लेकिन प्रति व्यक्ति आय नहीं बढ़ी। लालू के 15 साल के नाम पर राज करते रहे नीतीश लेकिन बेहतरी के लिए कुछ नहीं किया।" हालांकि प्रति व्यक्ति आय बढ़ाने के लिए पीके क्या करेंगे ये बताना भूल गए। उनकी प्राथमिक शिक्षा नीति क्या होगी ये भी बताना भूल गए। कुल मिलाकर पीके वही काम कर रहे थे जिसे तेजस्वी यादव ठीक से नहीं कर पा रहे हैं।

वैचारिक धरातल पर भी नीतीश को तेजस्वी स्टाइल में ही कोसते नजर आए। कल तक ऐसा लग रहा था कि पीके किसी ठोस कार्यक्रम के साथ मैदान में ताल ठोकेंगे। ऐसा कुछ भी नहीं था। गांधी-गोडसे का जिक्र कर वो फंस गए। दरअसल वो एक ही साथ नरेंद्र मोदी, अमित शाह और नीतीश कुमार तीनों को कोसने बैठे थे। पर किसी पत्रकार ने याद दिला दिया कि वो पिछले पांच साल में सभी के साथ काम कर चुके हैं।

बिहार विकास मिशन में फेल हुए पीके

प्रशांत किशोर जब नीतीश की विफलताओं के फेहरिस्त जारी कर रहे थे तब शायद इतिहास भूल गए। 2015 में सरकार बनने के बाद नीतीश कुमार ने उन्हें कैबिनेट मंत्री का दर्जा दिया। योजनाओं के क्रियान्वयन और नीतिगत मामलों में वो नीतीश के सलाहकार बनाए गए। यही नहीं पीके के कहने पर ही बिहार विकास मिशन का गठन हुआ। इसका काम पूरे राज्य में अहम योजनाओं को प्रभावी तरीके से लागू करना था। लेकिन पीके बुरी तरह विफल रहे। वो सुपर कैबिनेट की तरह काम करना चाहते थे। इस पर विरोध तो अलग वो काम ही शुरू नहीं कर पाए। जल्दी ही उन्होंने बिहार से बिस्तर समेट लिया। इसलिए रणछोड़ पीके पर बिहार का भरोसा हासिल करने की महती चुनौती है।