कोरोना वायरस से कच्चे तेल की कीमतें धड़ाम, समझिए भारत और अन्य देशों के लिए इसके मायने


नई दिल्ली
कच्चे तेल की कीमतें (crude oil falling prices) जीरो से भी नीचे यानी निगेटिव में जाने को भूल जाइए। उसके बजाय अवताद, जाना, असलफ और लुलु की प्रोग्रेस को फॉलो करिए, क्योंकि वह अमेरिका को चलाते हैं। इन सुपरटैंकर्स में सब के पास 20 लाख बैरल कच्चा तेल है। ये सुपरटैंकर्स अभी अपने तेल को अमेरिका में डंप करने का रास्ता ढूंढ रहे हैं। ये तो उन सुपरटैंकर्स की पहली खेप है, जिनमें कुल 4 करोड़ बैरल कच्चा तेल है, जो मई और जून में अमेरिका में आने वाला है। यही तेल की जियोपॉलिटिक्स को प्रभावित कर सकता है और साथ ही दुनिया पर भी अपना प्रभाव डाल सकता है।

अमेरिका खुद ही अपने तेल के बोझ तले दबा जा रहा है। शेल प्रोड्यूसर्स को तेल के प्रोडक्शन कम करना पड़ा है। स्टोरेज की कमी हो गई है और डिमांड क्रैश हो गई है। अब कोरोना काल में अमेरिका के फैसले पर सबकी नजर है कि वह तेल की कीमतें कम रखता है या अधिक रखता है। चुनावी साल में यह एक कठिन फैसला है। शेल इंडस्ट्री ने बहुत सारे राज्यों में नौकरियां दी हैं, जो लोग ट्रंप को वोट करते हैं। इसी बीच तेल की कम कीमतों से अमेरिकी इकोनॉमी को रिकवरी करने और अधिक नौकरियां देने में मदद मिलेगी। अब सवाल ये है कि क्या अमेरिका टेक्सस और नॉर्थ डकोटा के नाराज लोगों की मदद के लिए सऊदी से आने वाले तेल पर बैन लगाएगा? या सब वैसे ही चलने देगा और अपनी तेल इंडस्ट्री को बढ़ाएगा? दोनों ही सूरतों में अमेरिका-सऊदी का रिश्ता एक नाजुक मोड़ पर आ चुका है।


सऊदी ने जानबूझ कर क्रैश की कीमतें
अमेरिका मानता है और वह गलत भी नहीं है कि सऊदी अरब ने जानबूझ कर तेल की कीमतों को क्रैश किया है, ताकि अमेरिकी शेल इंडस्ट्री तबाह हो जाए। ट्रंप ने अमेरिका, सऊदी अरब और रूस के बीच एक डील के लिए मार्च में पहल की थी। कच्चे तेल के प्रोडक्शन में रोजाना 1.5 करोड़ बैरल की कटौती की इस डील से दुनिया पर कोई खास असर नहीं पड़ा, क्योंकि मांग ही 3 करोड़ बैरल प्रतिदिन के हिसाब से कम हो गई। लेकिन ये सब तब हुआ जब सऊदी अरब और रूस ने मार्च में एक हाई स्टेक गेम खेला। जब ओपेक-प्लस डील धराशाई हुई तो रूस और सऊदी अरब ने बाजार में ढेर सारा तेल सप्लाई कर दिया। रूस ने अपने 600 अरब डॉलर के फॉरेक्स रिजर्व का फायदा उठाया और प्रोडक्शन ब्रेक ईवन कॉस्ट 42 डॉलर पर पहुंचा, जो सऊदी को 84 डॉलर का आधा है, ताकि वह प्राइस वॉर में बचा रह सके। आखिर में कोरोना वायरस ने इसका फैसला किया।


सिर्फ तेल पर निर्भरता काफी नहीं
सऊदी अरब और यूएई दोनों की ही अर्थव्यवस्था लगातार गिरती जा रही है। ईरान को भी दिक्कतों का सामना कर रहा है, जिस पर पहले से ही तमाम प्रतिबंध लगे हैं। लेकिन अगर इराक में तेल की कीमतें बहुत गिरती हैं तो ईरान उस पर मजबूत पकड़ बना लेगा, जिससे सीरिया और इराक में इसकी अहमियत और बढ़ जाएगी। अब किसी देश के लिए सिर्फ तेल पर निर्भर रहना काफी है नहीं है, बल्कि और अधिक डायवर्स इकोनॉमी की जरूरत है। भले ही बात सऊदी अरब की हो, वेनेजुएला की हो, एक्वाडोर की हो, एंगोला, नाइजीरिया या लीबिया की हो, सबको इससे नुकसान होगा।


वहीं भारत, चीन, जापान और कोरिया जैसे खरीदार इसे एक मौके की तरह देखेंगे। चीन इसमें सबसे बड़ा प्लेयर है। यह रिकवर कर रहा है और इसकी इकोनॉमी संभल रही है। यह सभी गल्फ देशों का सबसे अहम पार्टनर हो सकता है। चीन का वेनेजुएला और इक्वाडोर के साथ-साथ एंगोला के काफी कर्ज पर मजबूत पकड़ है। भले ही चीन की घरेलू अर्थव्यवस्था अभी गड़बड़ाई हुई है, लेकिन चीन से बाहर एक अहम रोल अदा करने के लिए उसने अपनी पकड़ मजबूत बनाई हुई है।


भारत को होगा गिरती कीमतों से फायदा
भारत की अर्थव्यवस्था पहले ही धीमी रफ्तार से चल रही थी और इसी बीच कोरोना वायरस के प्रकोप ने सब कुछ ठप कर दिया है। अब भारत के लिए अच्छी बात सिर्फ इतनी सी है कि कच्चे तेल की कीमतें गिर रही हैं। इससे भारत के फिस्कल डेफिसिट में देश को मदद मिलेगी और सरकार को अर्थव्यवस्था को दोबारा पटरी पर लाने में आसानी होगी।