पीएम नरेंद्र मोदी ने यूं ही नहीं कहा 'वयं राष्ट्रे जागृयाम', छिपा है बड़ा संदेश


नई दिल्ली
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने राष्ट्र के नाम संबोधन में लोगों से लॉकडाउन का पालन करने की अपील की। उन्होंने संबोधन में लोगों से सात वचनों का पालन करने को कहा और आखिर में 'वयं राष्ट्रे जागृयाम' कहते हुए अपना संबोधन खत्म किया। पीएम की इस छोटी सी संस्कृत सूक्ति की लाइन में बड़ा संदेश छिपा है।
यह सूक्ति 'वयं राष्ट्रे जागृयाम पुरोहिताः' यजुर्वेद के नौवें अध्याय की 23वीं कंडिका से लिया गया है। इसका अर्थ है, 'हम पुरोहित राष्ट्र को जीवंत और जाग्रत बनाए रखेंगे।' पुरोहित का अर्थ होता है जो इस पुर का हित करता है। प्राचीन भारत में ऐसे व्यक्तियों को पुरोहित कहते थे, जो राष्ट्र का दूरगामी हित समझकर उसकी प्राप्ति की व्यवस्था करते थे। पुरोहित में चिन्तक और साधक दोनों के गुण होते हैं, जो सही परामर्श दे सकें। यजुर्वेद में लोक व्यवहार से पूर्ण उपदेश वर्णित किए गए हैं।


सूक्ति से हटाया 'पुरोहिताः'
खास बात यह है कि इस सूक्ति में पीएम मोदी ने 'पुरोहिताः' शब्द हटा दिया। उन्होंने सिर्फ कहा 'वयं राष्ट्रे जागृयाम:'। इसका अर्थ हुआ, 'हम राष्ट्र को जीवंत और जाग्रत बनाए रखेंगे।' कोरोना वायरस से जंग में पीएम मोदी ने सभी लोगों का साथ मांगा है और उन पर ही राष्ट्र को जीवंत और जाग्रत बनाने का दारोमदार डाला है।


इस सूक्ति के मायने हैं कि जो समाज का अग्रणी हो, उसे पुरोहित कहते हैं। जो समाज को आगे ले जाने का सामर्थ्य रखे, उसे पुरोहित कहते हैं। जिसे अपने पर पूर्ण विश्वास हो कि देवगण उसकी बात सुनेंगे, जो यजमान को यज्ञफल दिला सके उसे पुरोहित कहते हैं। कोरोना से लड़ाई में पीएम मोदी भी यही काम कर रहे हैं। उन्हें विश्वास है कि भारत को सारी कठिनाइयों से उबारा जा सकता है।


अपने संबोधन में भी पीएम ने हमेशा कहा है कि सरकार का लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाना न सिर्फ उनका लक्ष्य है बल्कि ये उन्होंने किया भी है। इसी पुरोहित को चौकन्ना होकर राष्ट्र को जगाना है, लेकिन उन्होंने लोगों से राष्ट्र को जीवंत और जाग्रत बनाने का आह्वान किया है।