फिर जारी हो सकता है मरीजों का डिस्चार्ज प्रोटोकॉल, नेगेटिव रिजल्ट के बाद भी कोरोना पॉजिटिव आ रहे मरीज


नई दिल्ली


कोरोना को लेकर वैज्ञानिकों ने रोगियों के लिए डिस्चार्ज प्रोटोकॉल को फिर से जारी करने का आह्वान किया है क्योंकि हाल के अंतरराष्ट्रीय अध्ययनों से पता चला है कि लोग कोरोना के लगातार दो नेगेटिव रिजल्ट के बाद भी वायरस के पॉजिटिव रिजल्ट आ सकते हैं। यह शोध ऐसे समय में आया है जब दक्षिण कोरियाई अधिकारियों ने 91 रोगियों की रिपोर्ट की, जिन्हें पहले कोरोना वायरस से नेगेटिव बताया गया था। लेकिन बाद में उन्हें पॉजिटव पाया गया था। 


अमेरिका में मेयो क्लिनिक में एक संक्रामक रोग विशेषज्ञडॉ प्रिया संपतकुमार ने बताया कि कोरोना पॉजिटिव होने पर आरटी-पीसीआर परीक्षण सबसे उपयोगी होता है। यह कोविद -19 पॉजिटिव होने पर कम उपयोगी है। एक नेगेटिव टेस्ट का मतलब व्यक्ति न हो ये जरूरी नहीं।


भारत की बात करें तो देश में कोरोना पीड़ितों की तादाद नौ हजार के पार पहुंच गई। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार, मरीजों की संख्या 9152 जबकि मृतकों की संख्या 308 तक पहुंच गई है। पिछले चौबीस घंटों में 35 की मृत्यु हो गई जबकि 705 और लोग कोरोना की चपेट में आए हैं। 25 मार्च को लॉकडाउन शुरू होने से पूर्व की संख्या देश में 606 थी तथा 25 मार्च के इसमें 17 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई थी। 12 अप्रैल को कोरोना रोगियों की संख्या 8447 तक पहुंच गई है लेकिन दैनिक वृद्धि दर 17 फीसदी से घटकर 12.4% की करीब है। रोगियों की संख्या को यदि देखा जाए तो इनमें 1300 फीसदी का इजाफा हो चुका है। महाराष्ट्र कोरोना से सर्वाधिक प्रभावित है।


कोविड-19 वायरस को समझने की वैज्ञानिक जितनी कोशिश कर रहे हैं, उतने ही रहस्य गहराते जा रहे हैं। कई देशों में जांच में यह बात सामने आ रही है कि कोरोना मरीजों में उपचार के बाद फिर संक्रमण का खतरा बरकरार है। दोबारा जांच में कई बार टेस्ट पॉजिटिव आना इस ओर संकेत करता है कि यदि ठीक होने के बाद रक्त में एंटीबॉडीज नहीं बन रही हैं तो फिर संक्रमण का खतरा हो सकता है। चीन के फुदान विश्वविद्यालय के अस्पताल ने 130 स्वस्थ हो चुके मरीजों में एंटीबॉडीज की जांच की। इनमें आठ फीसदी यानी दस मरीजों में एंटीबॉडीज मिले ही नहीं। जबकि 30 फीसदी में एंटीबाडीज मिले पर उनकी मात्रा बेहद कम थी। जिन मरीजों में एंटीबॉडीज नहीं पाए गए, उन दस में से नौ की उम्र 40 साल से नीचे थी। यह शोध भारत के संदर्भ में भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि सरकार कोविड हॉटस्पॉट में एंटीबॉडीज के आधार पर संग्दिध मरीजों की जांच शुरू करने जा रही है। लेकिन यदि शरीर में एंटीबॉडीज बनेंगे ही नहीं तो मरीज की पहचान कैसे हो पाएगी।


 


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