भारत-चीन में 40 से ज्यादा सालों से क्यों नहीं चली एक भी गोली?


नई दिल्ली
भारत और चीन के सैनिकों के बीच सीमा पर पिछले एक हफ्ते में दो बार झड़प हो चुकी है। इसमें दोनों ही पक्षों के कुछ सैनिकों को चोटें आई हैं। पहली झड़प 5 मई को लद्दाख में हुई तो दूसरी झड़प 9 मई को सिक्किम से सटे बॉर्डर पर हुई। तनाव ज्यादा बढ़ता उससे पहले ही दोनों जगह मामले को फ्लैग मीटिंग के जरिए सुलझा लिया गया। दरअसल, भारत-चीन सीमा पर दोनों देशों के सैनिकों के बीच टकराव आम है। दोनों देशों के सैनिकों में हाथापाई की खबरें अक्सर आती रहती हैं। कभी-कभी पत्थरबाजी भी हो जाती है। लेकिन पिछले 4 दशकों से कभी भी गोलीबारी जैसी घटना नहीं हुई है।
'परिपक्वता' की वजह से नहीं चलती गोली
सीमा पर दोनों देशों के बीच तनाव के बावजूद एक भी गोली नहीं चलती है। इसकी बड़ी वजह दोनों देशों की परिपक्वता है। 2017 में डोकलाम में भारत-चीन के बीच 73 दिनों तक सैन्य गतिरोध बना रहा लेकिन दोनों ही पक्षों की तरफ से संयम का परिचय दिया गया। लंबे गतिरोध के बावजूद एक भी गोली नहीं चली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसका श्रेय दोनों देशों की परिपक्वता को दिया था। 2017 में रूस के सेंट पीटर्सबर्ग इंटरनैशनल इकनॉमिक फोरम में पीएम मोदी ने कहा था, 'यह सही है कि हमारा चीन के साथ सीमा विवाद है। लेकिन पिछले 40 सालों में सीमा विवाद की वजह से एक भी गोली नहीं चली है। यह हमारी परिपक्वता को दिखाता है।' दोनों देशों की सेनाओं के बीच आखिरी बार गोलीबारी 1975 में हुई थी, जिसमें दोनों पक्षों को कोई नुकसान नहीं हुआ था।


तनाव को तत्काल खत्म करने की पुख्ता व्यवस्था
सीमा विवाद सैन्य टकराव में तब्दील हो बड़े संघर्ष का रूप न ले, इसके लिए दोनों देशों की तरफ से पुख्ता व्यवस्था की गई है। ऐसी किसी भी स्थिति में फ्लैग मीटिंग के जरिए विवाद को जल्द ही निपटा लिया जाता है। इसमें ब्रिगेडियर स्तर के अधिकारी हिस्सा लेते हैं। दोनों देशों की सेनाओं के बीच नियमित फ्लैग मीटिंग होती रहती है। बॉर्डर मैनेजमेंट के लिए दोनों देशों के बीच बातचीत का सिलसिला चलता रहता है।


इसके अलावा दोनों देशों ने आपसी सहमति से सैनिकों की तैनाती से जुड़े कुछ नियम तय कर रखे हैं। दोनों ही देशों की तरफ से अग्रिम पंक्ति में तैनात सैनिकों के पास आम तौर पर हथियार नहीं होते। अगर बड़े अधिकारियों के पास हथियार होते भी हैं तो उसकी नोक नीचे जमीन की तरफ रखी जाती है। यही वजह है कि ज्यादातर संघर्ष हाथापाई या कभी-कभी पत्थरबाजी तक सीमित रहते हैं।


क्यों होती रहती है हाथापाई
दोनों देशों के बीच सीमा पर पट्रोलिंग के वक्त अक्सर टकराव होता रहता है। कभी दोनों पक्षों में तीखी बहस होती है तो कभी कभार हाथापाई तक हो जाती है। ऐसा लगता है जैसे कुश्ती चल रही हो। अब तो चीनी सैनिक पत्थरबाजी तक करने लगे हैं। लद्दाख में 5 मई को यही हुई था। दोनों पक्षों में टकराव की बड़ी वजह सीमा को लेकर अस्पष्टता है। मैदानी इलाका नहीं है, पहाड़, पहाड़ी, जंगल, पठार वगैरह की वजह से सीमा को लेकर दोनों देशों की अपनी-अपनी समझ है। दोनों पक्ष अपने-अपने इलाके में गश्त करते रहते हैं। जब कभी संयोग से एक ही वक्त में एक ही जगह पर दोनों पक्ष गश्त के लिए पहुंचते हैं तो टकराव की नौबत आ जाती है। चीनी सैनिक अक्सर भारतीय इलाकों में आकर वहां पेंटिंग कर देते हैं कि इलाका उनका है। चीन भी भारत पर आरोप लगाता है कि हमारे सैनिक गश्त करते-करते उनके इलाकों में पहुंच जाते हैं।


पंचशील समझौते की भी है भूमिका
भारत और चीन के बीच 1954 में बहुचर्चित पंचशील समझौता हुआ था। हालांकि, 1962 में चीन ने इस समझौते की धज्जी उड़ाते हुए 'हिंदी-चीनी भाई-भाई' की भावना को तार-तार कर दिया था। चीन के उस धोखे के बाद पंचशील समझौता का कोई खास अर्थ तो नहीं रह जाता लेकिन इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि दोनों देशों के बीच मौजूदा बॉर्डर मैनेजमेंट सिस्टम की बुनियाद इसी समझौते में है। पंचशील समझौते में इन 5 बातों का जिक्र था-


1-एक दूसरे की अखंडता और संप्रभुता का सम्मान
2- एक दूसरे पर आक्रामक न होना
3-एक दूसरे के आंतरिक मामलों में दखल नहीं देना
4-समान और परस्पर लाभकारी संबंध
5- शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व


एक भी गोली चली तो बात बिगड़ सकती है
दोनों देशों के सैन्य अफसरों को यह बात अच्छी तरह से पता है कि टकराव के वक्त किसी भी पक्ष से अगर गोली चला दी गई तो बात बहुत बिगड़ सकती है। यही वजह है कि दोनों ही पक्ष संयम का परिचय देते हैं। दोनों पक्ष कोशिश करते हैं कि तनाव और ज्यादा भड़के, उससे पहले ही उसे सुलझा लिया जाए। इसमें ब्रिगेड कमांड लेवल की बैठकें काफी कारगर साबित होती हैं।


...लेकिन सावधानी जरूरी
दोनों देशों के बीच आपसी समझ की वजह से सीमा पर गोलीबारी नहीं होती। लेकिन चीन की कुटिलता को लेकर भारत को सावधान रहना पड़ेगा। चीन ने सीमाई इलाकों में तेजी से इन्फ्रास्ट्रक्चर का निर्माण किया है। इस मामले में भारत उससे पीछे नहीं, बहुत पीछे है। भारत भी धीरे-धीरे इन्फ्रास्ट्रक्चर बढ़ा रहा है, हालांकि इसे काफी तेज करने की जरूरत है। इसकी वजह यह है कि चीन कभी भी 1962 जैसे धोखे को दोहरा सकता है। बॉर्डर पर चीन की तरफ से आक्रामक ढंग से इन्फ्रास्ट्रक्चर को बढ़ाना इस आशंका को और मजबूत करता है।