हनुमानगढ़ के आसपास टिड्डियों का हमला, दौड़कर खेतों को बचाने पहुंचे किसान; 21 जिलों में देखा जा रहा प्रभाव


हनुमानगढ़. राजस्थान में टिड्डियों का प्रकोप लगातार जारी है। राज्य में जगह-जगह टिड्डियों द्वारा फसलें चट की जा रही है। मंगलवार को ऐसा ही नजारा हनुमानगढ़ के पास पीलीबंगा में भी देखा गया। जहां बड़ी संख्या में टिड्डियों का दल पहुंचा। इस दौरान किसान थाली, पीपे और बर्तन बजाकर टिड्डियों को भगाते दिखे। वहीं, जयपुर के आसपास चौमूं, आमेर और झोटवाड़ा में भी कहीं-कहीं टिड्डियों का दल देखा गया। 


हनुमानगढ़ के पास पीलीबंगा में टिड्डियों के झुंड से किसानों के साथ साथ आमजन भी सकते में आ गए। पीलीबंगा में धानमंडी के नजदीक स्थित कृषि भूमियों में किसान भागकर पहुंचे। टिड्डियों को भगाने का प्रयास किया। गांव अमरपुरा राठान के काश्तकार बलविंद्र सिंह चहल ने बताया कि ये टिड्डियां नरमे की फसल के लिए बेहद घातक साबित होंगीं। 


प्रदेश के 21 जिले प्रभावित; 51 हजार हैक्टेयर से ज्यादा खेतों में सरसों-जीरा-गेहूं की फसल को हो चुका है नुकसान


कृषि विभाग के संयुक्त निदेशक सुवालाल के मुताबिक प्रदेश में करीब 51 हजार हेक्टेयर से ज्यादा क्षेत्रफल पर टिड्डियों का प्रभाव हो चुका है। पिछले साल प्रदेश के 12 जिलों पर टिड्डियों ने हमला किया था। इनमें जैसलमेर, बाड़मेर, जोधुपर, बीकानेर, जालौर, सिरोही, पाली, नागौर, उदयपुर, चूरू, हनुमानगढ़, गंगानगर में करीब 7 लाख हैक्टेयर में सरसों, जीरा, ईसबगोल और गेहूं की फसल को टिड्डियों ने चौपट कर दिया था। इस बार 21 जिलों में टिडि्डयों का प्रभाव देखा जा रहा है। इनमें अजमेर, चित्तौड़गढ़, प्रतापगढ़, झालावाड़, बूंदी, सीकर, जयपुर और दौसा भी शामिल हैं। इनमें से सरकार ने करीब 8 जिलों के प्रभावित 77 हजार किसानों का सर्वे करवाया है। इनमें से 55 हजार किसानों को 89 करोड़ रुपए की सहायता भी दी गई।


कृषि विभाग के उप निदेशक बीआर कड़वा का कहना है कि पश्चिम से आने वाली आंधियां टिडि्डयों को जयपुर तक लाई। अधिकतर टिड्डियां भूमध्य सागर के देशों अफ्रीका, ईरान में प्रजनन करती हैं। यहां से अफगानिस्तान, पाक होते हुए भारत पहुंचने में समय लगता है। पिछले साल टिड्डियों ने अफगान-पाक बॉर्डर, सिंधु घाटी के आसपास ब्रीडिंग की। पाक ने कंट्रोल का उपाय नहीं किया। इसी के चलते बरसात के मौसम से पहले गर्मियों में ही राजस्थान व पंजाब से सटी पाक सीमा से टिड्डियों का प्रवेश हो गया। 


12 हफ्ते तक ही जीवित रहती हैं ये टिडि्डयां


    अपने जीवन चक्र में लोकस्ट 3 बार अंडे देती हैं। ये रात को ही अंडे देती हैं।
    नमी में ही अंडा हैच होता है। इसमें 2 हफ्ते का समय लगता है। 10 डिग्री से नीचे अंडों से जीव बाहर नहीं निकल पाते।
    6 हफ्ते तक इमैच्योर ही रहते हैं। 8 सप्ताह तक हाॅपर्स कहलाते हैं फिर 4 हफ्ते और जीवित रहते हैं। ये अंडे देने में सक्षम नहीं होते यानी हमारे इलाकों में ब्रीडिंग का खतरा नहीं है।


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