साहब! हमारा बस एक कसूर है कि हम गरीब हैं'



कोई पैसों से मजबूर तो किसी को किस्‍मत ने किया लाचार, घरवापसी के लिए जूझते इन लोगों का दर्द रुला देगा
नई दिल्‍ली
वो प्रवासी मजदूर हैं, इन दिनों यही उनकी पहचान है। लॉकडाउन में रोजी-रोटी का जुगाड़ बंद हुआ तो भूखों मरने के दिन आ गए। इसलिए पैदल ही अपने घर को निकल पड़े। किसी का घर 500 किलोमीटर दूर है तो किसी का हजार। कोई ढाई-तीन हजार किलोमीटर दूर अपने गांव जाने को बस किसी तरह चले जा रहा है। देश की सड़कों पर आजकल मजबूरी की जीती-जागती मिसालें रेंग रही हैं। उनकी आपबीती जानेंगे तो शायद एहसास हो पाए कि उनका दर्द क्‍या है और इस हालात में वे क्‍या सोच रहे हैं।


रेलवे स्‍टेशन पर मांग रहे टिकट की भीख
नई दिल्‍ली रेलवे स्‍टेशन के बाहर सैकड़ों प्रवासी मजदूर मौजूद हैं। जब उन्‍हें पता चला कि कुछ ट्रेनें चलने वाली हैं तो उम्‍मीद लेकर यहां आ गए। डेढ़ महीने तक किसी तरह लॉकडाउन में गुजर-बसर करने के बाद उनके पास एक पैसा नहीं बचा है। मगर उम्‍मीदें धराशायी होने में वक्‍त नहीं लगा। स्‍टेशन में घुस रहे लोगों के हाथ फैलाया कि कोई मदद कर दे, मगर किसी का दिल नहीं पसीजा। भरम कुमार, दीनानाथ, राजेश सिंह मोहम्‍मद गियास, मोहम्‍मद जाफरान, कुंदन देवी... बस नाम गिनते जाइए। ये सब स्‍टेशन पर हैं मगर ट्रेन का टिकट लेने को जेब में फूटी कौड़ी नहीं है।
सिर्फ यही गलती कि मैं गरीब हूं'
मोहम्‍मद गियास ने अपना दर्द साझा किया। उन्‍होंने कहा, "मेरी इकलौती गलती ये है कि मैं गरीब हूं। मैं आखिर ऐसा क्‍या करूं कि कोई मेरा दुख समझे और मुझे मेरे घर बिहार ले जाए। सरकार चाहे जो कहे कि वो हमारे लिए कर रही है, सच यही है कि हम सड़कों पर हैं, भीख मांग रहे हैं कि हमें घर जाने में मदद करें।" 25 साल की कुंदन देवी का पति मानसिक रूप से बीमार है। वह गुड़गांव से चलकर नई दिल्‍ली स्‍टेशन आई थीं। जब पुलिस से पूछा कि टिकट कैसे मिलेगा तो उन्‍होंने कुंदन के पति को लात मार दी। उसने अपना गुस्‍सा कुंदन और तीन साल की बेटी पर निकाला और यहां छोड़कर चला गया। अब कुंदन पूछती हैं कि वे अपने पति को कैसे ढूंढेगी या वो उन्‍हें कैसे खोजेगा। 
कदम-कदम पर जिंदगी ले रही इम्तिहान
असम के रहने वाले संतोष बोरा अमृतसर की एक फैक्‍ट्री में काम करते थे। लॉकडाउन हुआ तो पैदल ही 2,364 किलोमीटर दूर घर जाने निकल पड़े। बुधवार को नई दिल्‍ली रेलवे स्‍टेशन के बाहर फुटपाथ पर मिले संतोष की कहानी बेहद दर्दनाक है। पैदल चलते-चलते उन्‍होंने सिर्फ पानी पीया, खाने को कुछ नहीं मिला। कुछ किलोमीटर और चले होंगे कि उनके दो दोस्‍तों को सिर और पेट में भयानक दर्द शुरू हो गया। कई दिनों से खाना नहीं खाया था। घंटे भर में दोनों बेहोश हो गए। अस्‍पताल ले जाया गया तो पता चला मर चुके हैं। उसी शाम, किसी ने संतोष का सामान चोरी कर लिया। उसमें बचत के 2,000 रुपयों के अलावा पैन, आधार कार्ड, मोबाइल बैग था जो चला गया।
पति गुजर गया, घर जाने को पैसे नहीं
तीन दिन पहले, हरियाणा के मानेसर में रहने वाली 70 साल की सुशीला देवी को बिहार के छपरा में अपने पति के गुजरने की खबर मिली। ट्रेन चल गई है, ये जानकर सुशीला पैदल ही दिल्‍ली चली आई थीं। मगर उन्‍हें ये नहीं पता कि टिकट कैसे बुक करना है। सुशीला यहां घरेलू नौकरानी बनकर काम करने आई थीं मगर जिस दिन मानेसर में कदम रखा, उसी दिन लॉकडाउन हो गया। वो कहती हैं, "मुझे जाना है क्‍योंकि घर पर बेटी अकेली है। मेरा मोबाइल फोन गुम गया है और उससे बात भी नहीं कर पा रही हूं।" सुशीला के साथ उनके गांव के कुछ लोग भी हैं।


65 किलोमीटर पैदल चली गर्भवती महिला
गुड़गांव में काम करने वाली सोनी 8 महीने की गर्भवती हैं। अपने चाचा के यहां रहती थी, उनकी नौकरी चली गई। 17 साल का भाई भी साथ है। 670 रुपये इमर्जेंसी के लिए अलग निकालकर तीनों गुड़गांव से पैदल कानपुर जाने के लिए निकले थे। सोनी का पति वहीं रहता है। तपती धूप में पैदल 65 किलोमीटर चलते-चलते बुधवार शाम सोनी गाजियाबाद पहुंची। लालकुआं के पास सोनी सड़क पर बैठ गई और दर्द से बिलखने लगी। उसका पेट दुखता है। एक कार रोकने की कोशिश की मगर वो भी मदद नहीं कर सकता था क्‍योंकि लॉकडाउन में तीन से ज्‍यादा लोग गाड़ी में बैठ नहीं सकते। अच्‍छी बात ये रही कि कुछ दूरी पर मिले पुलिसवालों ने सोनी को अस्‍पताल में भर्ती कराया। फिर उसके पति को फोन किया। पास का इंतजाम कराया। वो अगले दिन उसी कार में वापस आया जिस कार को रोकने की कोशिश सोनी के चाचा कर रहे थे। अब सोनी अपने घर पर है। 


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